तुम
उन सिमटती सी लहरों से जुड़ा है किनारों का एक अटूट रिश्ता, इसलिए तो वो लहरें गर तीव्र रोष में निकल पड़ती है कभी, किनारों को पार कर, कहीं दूर निकल की ज़िद में तब थाम लेता है, वो किनारा उन लहरों को संयम से, प्रेम से, एक अजीब सी बेचैनी के साथ मानो उन्हें कहीं दूर जाने ही नहीं देना चाहता, खुद से! मेरे मन की चंचलता भी भिन्न तो नहीं, उन लहरों की ज़िद से, और जब भी निकलता हूं, किसी अनजानी राह पर, सोचकर कि दूर चला जाऊँ तुमसे, कहीं दूर, बहुत दूर, इतना कि कभी लौटने का मन भी करें, तो खुद को गुमराह ही पाऊँ, मगर हर इक राह पर, तुम्हारी मौजूदगी ही तो होती है और थाम लेती हो तुम, मुझे, हर बार ही, ठीक वैसे, जैसे वो किनारा थाम लेता है, उन लहरों की चंचलता-चपलता को संयम से, प्रेम से! ~ सूरज शर्मा