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Showing posts from 2021

अरसों की बातें

और वहां से शुरू होगा एक और सफर! कैसा महसूस होता है जब हम सब कुछ जीत लेते हैं— यह धरती, आकाश और पाताल! जब ये सरसराती हवाएं, ये वृक्ष, वन – बापी और ब्रह्मांड का प्रत्येक अंग हमारे अधीन हो जाता है! दिन ढलेगा, रात आएगी और फिर एक नई सुबह, लेकिन कोई अंतर नहीं पड़ेगा हमारे सब कुछ जीत लेने या हार जाने से! शून्यता नैसर्गिक है, जिसे न तुम नकार सकती हो और न मैं! अपने जिस अस्तित्व की खोज में, जिस उत्साह और सब कुछ जीत लेने की जिस ख्वाहिश से यहां इतनी दूर तक आया हूं मैं, वे तीनों उस वृक्ष के नीचे उस अर्थहीनता की चादर ओढ़े बैठे हैं! समय खुद में अरसों की उस निरंकुशता में लिप्त एक लयबद्ध तरीके से गतिमान है, लेकिन परिवर्तन कुछ भी नहीं! मैंने सब कुछ जीत लिया है— तुम, यह धरती, और अनंत तक फैला यह समस्त ब्योम— लेकिन बदला कुछ नहीं! वर्षों बीत चुके हैं... हमारे दरमियान उस आखिरी बात को हुए, जब तुमने कहा था… तुमने कहा था कि एक दिन मैं सब कुछ जीत लूंगा! तुम्हें पता है, मैंने सब कुछ जीत लिया है! लेकिन इस जीत को सहन करना, और सहन करते रहना, मेरे लिए पीड़ादायक ही नहीं, बल्कि भयावह यातनाओं से भरा है! मैं जीवन के उस अ...

अंतिम यथार्थ—2

  अहान अभी तक उस कुर्सी पर बैठे उस कलश को टकटकी लगाए देख रहा था! फिर न जाने उसे क्या सूझा वह इस कमरे से बाहर निकल आया! उसके घर के एन सामने एक विशाल रेतीला मैदान है, जो सीधा सागर के किनारे तक जाता है! वासुदेव काका का घर गांव के अन्य घरों से थोड़ा सा दूर है, ज्यादा नही, यही कोई 200 मीटर! गांव के मुख्यालय से बासुदेव काका के घर तक एक पक्की सड़क बनी है जो काका से घर के बगल तक, एन दाहिने ओर समाप्त होती है! अहान घर के बाहर दरवाजे हर खड़ा एक सुकून की गहरी सांस लेता है, लेकिन संसय के बादल अभी थी उसे घेरे हुए है! चांदनी स्निग्ध सी पूरे विशाल रेतीले मैदान में छितरी पड़ी है और उस स्निग्घ रोशनी में रेत का कण–कण स्वर्ण की भांति चमक रहा है! हल्की–हल्की शीत लहर अब चलने लगी है, जो उसके अंग–अंग में नवचेतना का संचार कर करती है, और एक सिरहन उसके पूरे बदन में दौड़ पड़ती है! वह एक क्षण कुछ सोचता है फिर घर के दरवाजे से आगे कदम रखता है और सीधा चलने लगता है, सागर के किनारे की ओर! थोड़ी देर चलते–चलते सागर के करीब पहुंच जाता है! सागर में उठ रही लहरों की उफान वह स्पष्ट सुन सकता है! ठीक समुद्र तल के ऊपर आकाश म...

अंतिम यथार्थ —1

  कमरे में एकदम सन्नाटा था! सन्नाटे से मेरा मतलब सिर्फ इतना है कि जगनुओं और झींगुर की कर्कश ध्वनि के अतिरिक्त कोई और शोर नही था! लग रहा था मानो वो रात उस पल में कैद होकर रह गई हो — या उस पल में ठहर जाना इस रात की नियति हो! खैर जो भी लेकिन वक्त उस पल में ठहर सा गया था!! चूंकि ये घर उड़ीसा के बहरामपुर से महज 20km दूर था– समुद्र से थोड़ा सा दूर– तो ठंडी तेज हवाओं का चलना लाज़मी था लेकिन आज एक पत्ता भी नही हिल रहा था! और गर्मी भी भीषण थी! अहान निस्तब्ध सा अपनी कुर्सी बैठा हुआ, न जाने कितने अरसों का मौन साधे हुए, उस कलश को निहारे जा रहा था— कलश मिट्टी का और उसके ऊपर लाल–कत्थई कपड़ा लपेटा हुआ था! उस कलश में क्या था– पता नहीं! लेकिन जिस एकाग्रता से वह उस कलश पर नजर गढ़ाए हुए था ऐसा प्रतीत होता था मानों उसकी जिस्मों–जान कैद हो उसमें!! अकसर कहानियों में होता है न– किसी सैतान की जान कबूतर में कैद हो! लेकिन इस हकीकत के परिदृश्य में किसकी जान किसमें कैद थी—पता नही! उसके मन में  विचारों की उत्कंठा अपने चरम पर थी! जिस अस्तित्व को वो इतने वर्षों से खुद में समेट बैठा था– आज उसकी ये अंतिम रात ...

तापिश और तुम

मेरे घोड़े के कदमों की रफ्तार इन हवाओं को चीरती हुई निकल रही है! आज सारे संसार की निगाहें मुझ पर हैं! इन लोगों को लगता है, मैं सब कुछ जीत लूंगी—धरती, आकाश, पाताल और अंततः अनंत तक फैले हुए ब्रह्मांड को! लेकिन इन यातनाओं, इन दुखों और पीड़ाओं को खुद में समेटकर, मुझे सब कुछ जीत लेना कभी गंवारा नहीं होगा! कुछ है विस्मित सा, जो मेरी रूह को, मेरे जिस्म को इस कदर नोच रहा है, जो मेरे लिए अवर्णित है! कुछ देर बाद जब मैं हार को गले लगाऊंगी, तब लोगों की निगाहें नहीं, उंगलियां उठेंगी मुझ पर! साथ ही मेरे काफिले से सजा का मोहताज बनना पड़ेगा मुझे! शायद सारा दिन मुझे चटकती धूप में खड़ा रखें, या फिर एक सौ कोड़ों की मार का आघात मेरे जिस्म को सहना पड़े, लेकिन वो इस पीड़ादायक जीत से बेहतर ही होगा! मुझमें सब कुछ जीत लेने की चाह नहीं, और अपनी चाहत के विरुद्ध कुछ करना पीड़ा से कम नहीं! या फिर मेरी नासिका से बहती यह लहू की धार मुझे अंत तक पहुंचने से पहले ही मूर्छित कर दे! पता नहीं! कुछ भी हो, लेकिन मैं नहीं जीतूंगी! जीत लेना कभी इस यात्रा का उद्देश्य था ही नहीं—मैं बस लड़ना चाहती थी अंतिम सांस तक और मैं लड़ी—जी...

नियति

किसी पाषाण और विटप का सफर, भी परिणति होती है, उन्हीं भयाभय वेदनाओं की, जिनसे जुड़ा होता है हर मानुष का रिश्ता ठीक उसके जन्म से, तुम चाहो भी, और मैं चाहकर भी, इस पीड़ा से मुक्त नहीं हो सकते— जैसे मुक्त नहीं होते ये पाषाण और विटप समय के वहाव से! ये फिर लैटेंगे एक नया रूप नई आकृति लेकर, सीप–शंख, या छाल के जैसे, उन यातनाओं को फिर–से भोगने, और भोगते रहने के वास्ते, स्वयं की नियति का निर्वाह करने ये फिर लैटेंगे ! पर तुम चाहो भी, और मैं चाहकर भी, इस पीड़ा से मुक्त नहीं हो सकते, जैसे मुक्त नहीं होते ये पाषाण और विटप समय के बहाव से!! ~ सूरज शर्मा

बंधित स्मृतियाँ

 मैंने अपनी आत्मा का सारा प्रेम सारी प्रीति उन पंक्तियों उन कविताओं में समेट दी है, जिनमें बात होती है सिर्फ तुम्हारी और मेरी, हमारी पहली मुलाकात की, और एक कहानी की शुरुआत की जिनमें बात होती है विरह के असहनीय दर्द की और जिनमें बात होती है, हमारे उस आखिरी किनारे पर मिलन की भी! हां, इनमें अब जो कुछ भी तुम्हारे हिस्से का है तुम रख लो, और अपना अस्तित्व मुझे दे दो!   ~ सूरज शर्मा  

क्षितिज की ओर

बहते चलो इन सैलाबों के साथ-साथ किसी-न-किसी दिन ये तुम्हें किनारे पर जरूर पहुंचा देंगे, तुम तब दूर फैले उस क्षितिज को निहारना, तुम पाओगे कि ये सफर कितना आकर्षक था!   तुम्हारी उनींदी आँखों का भारीपन उस पल में गुम सा जाएगा, तुम्हारे मन के घोड़े भी ठहरेंगे, और वह युद्ध वहीं समाप्त हो जाएगा! तुम बस दूर फैले उस क्षितिज को एक आखिरी बार देखना, तब तुम्हें लगेगा - सच में, यह खुद के अस्तित्व को खोने और पाने का सफर कितना आकर्षक था!   Nov 21, 2021/ सूरज शर्मा  

स्मृतियाँ

अतीत की लकीरें, अनायस ही खींचती चली जातीं, कोरे पन्नों पर, कुछ राज बयां करने, किन्हीं गलियों में दौड़ती यादों को, अनुभूतियों को शब्दों में पिरोने की चाहत में वक्त की लकीरें खींचती चली जातीं, और सजीव होने लगते हैं, कुछ एहसास, स्मृतियाँ, किसी का खोया हुआ व्यक्तित्व, खोया हुआ अस्तित्व!!!!    ~ सूरज शर्मा

ख्वाहिशें

(1) 21.10.2021 मुझे बेहद सुकून देता है खुले आसमान के नीचे बैठना, जब मेरे विचारों की श्रृंखला मेरी ख्वाहिशों के दायरे से परे निकलकर सुदूर ब्रह्मांड में निकल पड़ती है अपने कौतूहल की पताका थामे कुछ जानने कुछ परखने दूर तारों को छूने और कभी बरसात में दमकती दामिनी से इसकी चंचलता का राज पूछने मेरे विचारों की श्रृंखला, और हां, मुझे तो बेहद पसंद है इन अंधेरी रातों में खुले गगन के नीचे बैठना!! (2) 03.09.2021 अक्सर दिल करता है, आकाश में बनी इन पगडंडियों पे चलकर, कहीं दूर निकल जाऊँ मैं भी इतना कि शायद इस दुनिया का शोर मेरे कानो तक न पहुंच सके! ये आकाश भी तो अकेला है ना, प्रतीक्षा में किसी मुसाफिर की, इसलिए तो सजा दी हैं केसरिया रंग की ये पगडंडियाँ जिन पर चलकर कोई भटका हुआ पथिक आ सके उसके अकेलेपन को दूर करने, जिसके साथ ये बाँट सके अपने सारे ग़मों को!  ~सूरज शर्मा

उनींदी आंखें

उनींदी आंखें, कुछ सपने संजोए हुए, जो पनपने लगे हैं, संयोग से, देखा था जिन्हे़ं कभी खुली आंखों से! जिद्दी दिल थमता कहां? परवाज़ चढ़ाना है इसको, या उड़ना है खुले गगन में, पंख फैलाए, मानो सारे जहां के आयाम को नापना हो या जानना हो उस अज्ञात को जो अरसों तक अज्ञात ही रहा! उस दूर आकाश में आज चाद की चमक भी कुछ तेज़ सी है जिसमें चमकने लगी है उनींदी आंखें, और आंखों में कुछ रोशन सपने! दादी कहती थीं - टूटता तारा लोगों की ख्वाइशें पूरी कर जाता है, मालूम नहीं कहां तक सच्चाई है इसमें, बस इतनी सी तमन्ना है, कि कल ये चांद रहे या न रहे मगर उनींदी आंखों में मेरे सपनों की चमक कायम रहे! ~सूरज शर्मा

अंतहीन यात्रा

कोई ढलती सी शाम और क्षितिज पर बिखरी लाली, शिथिल दिवाकर के वापस अपने घर की राह पर लौटने का संकेत करती, अनकहे से शब्दों में उसकी मीलों की यात्रा का राज बयान करती कोई ढलती शाम, और आकाश में बिखरी लाली! एक संशय हर चीज के दृश्यहीन हो जाने के का तमश की बिखरी पंखों में खो जाने का मगर चांद आकर बटोर लेता पंखों को बसुधा के दामन से, जैसे दिनकर बटोर लेता तुहिन को शीत भोर में तरुओं से! और वापस लौट आते हैं तारे आठ प्रहरों के प्रवास काल के उपरांत! टिमटिमाते तारे, मुस्कुराते तारे, झिलमिलाते तारे, तारे ही तारे, जो बिखरे है हमारी मंदाकिनी के अंतिम छोर तक, या उससे भी परे! बस तारे ही तारे उस रागिनी के गोद में, किसी मुसाफिर का मार्गदर्शक बन जाते किसी मुझे से भटके को राह दिखा जाते! अंतत: इस यात्रा के अंतहीन बनने का सफर किसी ढलती सी शाम और नभ में बिखरी लाली से शुरू होकर अनंत काल तक चलता ही रहता, ठीक मेरे कमरे की दीवार पर टंगी उस घड़ी की सुई के जैसे "टिक_टिक_टिक........ निरंतर अनवरत! ~सूरज शर्मा

तुम

उन सिमटती सी लहरों से जुड़ा है किनारों का एक अटूट रिश्ता, इसलिए तो वो लहरें गर तीव्र रोष में निकल पड़ती है कभी, किनारों को पार कर, कहीं दूर निकल की ज़िद में तब थाम लेता है, वो किनारा उन लहरों को संयम से, प्रेम से, एक अजीब सी बेचैनी के साथ मानो उन्हें कहीं दूर जाने ही नहीं देना चाहता, खुद से! मेरे मन की चंचलता भी भिन्न तो नहीं, उन लहरों की ज़िद से, और जब भी निकलता हूं, किसी अनजानी राह पर, सोचकर कि दूर चला जाऊँ तुमसे, कहीं दूर, बहुत दूर, इतना कि कभी लौटने का मन भी करें, तो खुद को गुमराह ही पाऊँ, मगर हर इक राह पर, तुम्हारी मौजूदगी ही तो होती है और थाम लेती हो तुम, मुझे, हर बार ही, ठीक वैसे, जैसे वो किनारा थाम लेता है, उन लहरों की चंचलता-चपलता को संयम से, प्रेम से!   ~ सूरज शर्मा           

सागर सा गहरा

कुछ है जो इस मंद पवन में आकर ठहरा है, कुछ तो उलझा-उलझा सा, या सागर सा गहरा है! पेड़ों की पत्तियाँ, सहमे-सहमे से गिरती, मंद पवन झोकों में घुलके, मीलों दूरी तक चलतीं, ये बागों के पुष्प सुनहरे, जिनपे, भँवरे मधुवन की आश में बैठें है, अपनी ही मुस्कान के पिछे, एक दर्द छिपाए रखे हैं, चकवा-चकवी का जोड़ा, क्रंदन स्वर में अब गाता है, वसंत के इंतजार में उसका, कंठ जो सूखा जाता है, बारिश की बूंदों की सरगम, ताल से ताल मिलती है, उनकी प्यास बुझाने को, खुद निसार हो जाती है, चारु-चन्द्र की ये किरणें, वसुधा दामन में गिरती है, देख दृस्य खामोश रागिनी, प्रफुल्ल से सिसक पड़ती है! सागर की चंचल सी लहरें, शाहिल से मिलने आतीं हैं, एक लम्हा साथ बिताकर वे भी, दूर कहीं गुम जातीं हैं! इस गुमने-मिलने की क्रीड़ा में, प्रेम ही आकर ठहरा है, जो है तो उलझा-उलझा सा, मगर सागर के जितना गहरा है!   ~ सूरज शर्मा   

गुलाबी शाम

आजाद परिंदा अंबर का मैं और किसी गुलाबी शाम सी तुम, मेरे अधूरे नाम की पूर्णता, और उसकी पहचान सी तुम, कुछ ख्वाइशों लिए उड़ता में, उन ख्वाइशों की अज़ान सी तुम, आजाद परिंन्दा अंवर का मैं और कोई गुलाबी शाम सी तुम! सहर्ष विकल घुलती है पवन, जैसे मिला तुम्हीं से हो नवजीवन, उस जीवन का आधार सी तुम, आजाद परिंदा बरसों से में, और किसी गुलाबी शाम सी तुम!   ~ SunShine