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Showing posts from October, 2021

स्मृतियाँ

अतीत की लकीरें, अनायस ही खींचती चली जातीं, कोरे पन्नों पर, कुछ राज बयां करने, किन्हीं गलियों में दौड़ती यादों को, अनुभूतियों को शब्दों में पिरोने की चाहत में वक्त की लकीरें खींचती चली जातीं, और सजीव होने लगते हैं, कुछ एहसास, स्मृतियाँ, किसी का खोया हुआ व्यक्तित्व, खोया हुआ अस्तित्व!!!!    ~ सूरज शर्मा

ख्वाहिशें

(1) 21.10.2021 मुझे बेहद सुकून देता है खुले आसमान के नीचे बैठना, जब मेरे विचारों की श्रृंखला मेरी ख्वाहिशों के दायरे से परे निकलकर सुदूर ब्रह्मांड में निकल पड़ती है अपने कौतूहल की पताका थामे कुछ जानने कुछ परखने दूर तारों को छूने और कभी बरसात में दमकती दामिनी से इसकी चंचलता का राज पूछने मेरे विचारों की श्रृंखला, और हां, मुझे तो बेहद पसंद है इन अंधेरी रातों में खुले गगन के नीचे बैठना!! (2) 03.09.2021 अक्सर दिल करता है, आकाश में बनी इन पगडंडियों पे चलकर, कहीं दूर निकल जाऊँ मैं भी इतना कि शायद इस दुनिया का शोर मेरे कानो तक न पहुंच सके! ये आकाश भी तो अकेला है ना, प्रतीक्षा में किसी मुसाफिर की, इसलिए तो सजा दी हैं केसरिया रंग की ये पगडंडियाँ जिन पर चलकर कोई भटका हुआ पथिक आ सके उसके अकेलेपन को दूर करने, जिसके साथ ये बाँट सके अपने सारे ग़मों को!  ~सूरज शर्मा

उनींदी आंखें

उनींदी आंखें, कुछ सपने संजोए हुए, जो पनपने लगे हैं, संयोग से, देखा था जिन्हे़ं कभी खुली आंखों से! जिद्दी दिल थमता कहां? परवाज़ चढ़ाना है इसको, या उड़ना है खुले गगन में, पंख फैलाए, मानो सारे जहां के आयाम को नापना हो या जानना हो उस अज्ञात को जो अरसों तक अज्ञात ही रहा! उस दूर आकाश में आज चाद की चमक भी कुछ तेज़ सी है जिसमें चमकने लगी है उनींदी आंखें, और आंखों में कुछ रोशन सपने! दादी कहती थीं - टूटता तारा लोगों की ख्वाइशें पूरी कर जाता है, मालूम नहीं कहां तक सच्चाई है इसमें, बस इतनी सी तमन्ना है, कि कल ये चांद रहे या न रहे मगर उनींदी आंखों में मेरे सपनों की चमक कायम रहे! ~सूरज शर्मा