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Showing posts from March, 2025

उम्मीद नहीं

तुम्हें लौटने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, किसी भी इंसान को किसी दूसरे इंसान के लौटने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। यह अच्छी बात है कि एक वक्त बाद मिले हो, तो साथ में समय बिताओ, मगर उम्मीद मत करो किसी के लौटकर आने की। उम्मीद मत करो कि तुम मुझे फिर से मिल पाओगे या मैं तुम्हें फिर से देख सकूंगा। जिंदगी काफी नाजुक है, कभी भी टूटकर बिखर सकती है। एक वक्त बीत गया है। मैं अक्सर खुद के लिखे को पढ़ता हूँ, तो खुद पर हंसी आती है—हाँ, हंसी आती है। नादान नहीं कहना चाहिए, बेवकूफ ठीक है। इंसान की जिंदगी में एक उम्र ऐसी आती है, जिसके बाद वे बड़े होना छोड़ देते हैं। उनके विचारों की सीमाएं चरम पर पहुंच जाती हैं। उस वक्त वे जो कुछ लिखते हैं, वह उनकी वह रचना होती है जिसे वे अपने बाकी लिखे की तुलना में सबसे बेहतर कह सकते हैं। लेकिन उससे आगे कुछ नहीं है, और यह कई सारी सीमाओं और बंदिशों के साथ आता है। तुम वही सारे शब्दों, ख्यालों और विचारों के इर्द-गिर्द घूमते रहते हो। वह रास्ता सीमाहीन नहीं होता। तुम उससे बेहतर नहीं लिख सकते। मेरी सालों से इच्छा थी किसी सीमाहीन रास्ते पर खुद को गुम कर देने की, मगर अब लगता है कि ...

मान लो

मान लो कुछ हुआ नहीं, मान लो कभी देखा नहीं तुम्हे मैने, मान लो कभी मिला नहीं मैं तुमसे, मान लो मैं नहीं गया सपनों के शहर कभी, मान लो मैंने कभी गौर नहीं किया तुम्हारी शरारतों पर, चंचलता पर, मान लो नहीं आया खयाल मुझे — कभी तुम्हें प्यार से गले लगाने का। मान लो कुछ हुआ नहीं। न दिन ढला, न रात आई, वक़्त थमा रहा, एक उम्र गुज़र जाने तक। मान लो मैंने नहीं चाहा वक़्त के साथ चलना, मैं रुका रहा, ठिठका सा, एक निष्ठुर वृक्ष की तरह। मान लो मैंने कभी महसूस नहीं किया तुम्हारा मेरे क़रीब से गुज़र जाना, जब फ़ासला हमारे दरमियां एक इंच से कम था। मान लो मैंने महसूस नहीं किया तुम्हारा मेरे पास से गुज़र जाना और हमारा एक-दूसरे को इस कदर नज़रअंदाज़ करना जिस कदर एक अजनबी अजनबी को नहीं करता। मान लो कुछ हुआ नहीं, मान लो तुम्हें नहीं देखा कभी मैने, मान लो कभी नहीं मिला तुमसे में जैसे मैने मान लिया है ठीक उस नदी की तरह, जैसे वो मान लेती है— उसकी नियति सागर में विलीन होना ही है, उसकी लकीरों में नहीं लिखा प्रेम के साथ चलना। बिना उम्मीद के फिर भी चलती है, दोनों किनारों को साथ लिए। — सूरज शर्मा