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The Truth Is

And the truth is, I’m tired. Exhausted. Bored. Burdened. It’s something that feels more permanent now, as if this weight will stretch all the way to the end. That’s what makes it hard. It’s not that it's difficult today, but that tomorrow doesn’t seem different either. There’s no escape. Just a quiet, lingering sense that this is how it’s going to be. I keep losing myself. I have done it so often that it no longer feels unfamiliar to me. But what has changed is the passion, the passion I once had. It is gone. It no longer runs through my veins, no longer burns in my head or blood. What remains is something colder. frozen blood. Still. Sometimes I wish I could just sleep... for a year, two, ten, a hundred, It doesn’t really matter. There’s a kind of heaviness, a weariness in my mind, as if I haven't slept for years. The path I have walked so far doesn’t seem to be leading anywhere. And when I look ahead, no "two roads diverging in a wood" that one could take. Nothing. ...

उम्मीद नहीं

तुम्हें लौटने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, किसी भी इंसान को किसी दूसरे इंसान के लौटने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। यह अच्छी बात है कि एक वक्त बाद मिले हो, तो साथ में समय बिताओ, मगर उम्मीद मत करो किसी के लौटकर आने की। उम्मीद मत करो कि तुम मुझे फिर से मिल पाओगे या मैं तुम्हें फिर से देख सकूंगा। जिंदगी काफी नाजुक है, कभी भी टूटकर बिखर सकती है। एक वक्त बीत गया है। मैं अक्सर खुद के लिखे को पढ़ता हूँ, तो खुद पर हंसी आती है—हाँ, हंसी आती है। नादान नहीं कहना चाहिए, बेवकूफ ठीक है। इंसान की जिंदगी में एक उम्र ऐसी आती है, जिसके बाद वे बड़े होना छोड़ देते हैं। उनके विचारों की सीमाएं चरम पर पहुंच जाती हैं। उस वक्त वे जो कुछ लिखते हैं, वह उनकी वह रचना होती है जिसे वे अपने बाकी लिखे की तुलना में सबसे बेहतर कह सकते हैं। लेकिन उससे आगे कुछ नहीं है, और यह कई सारी सीमाओं और बंदिशों के साथ आता है। तुम वही सारे शब्दों, ख्यालों और विचारों के इर्द-गिर्द घूमते रहते हो। वह रास्ता सीमाहीन नहीं होता। तुम उससे बेहतर नहीं लिख सकते। मेरी सालों से इच्छा थी किसी सीमाहीन रास्ते पर खुद को गुम कर देने की, मगर अब लगता है कि ...

मान लो

मान लो कुछ हुआ नहीं, मान लो कभी देखा नहीं तुम्हे मैने, मान लो कभी मिला नहीं मैं तुमसे, मान लो मैं नहीं गया सपनों के शहर कभी, मान लो मैंने कभी गौर नहीं किया तुम्हारी शरारतों पर, चंचलता पर, मान लो नहीं आया खयाल मुझे — कभी तुम्हें प्यार से गले लगाने का। मान लो कुछ हुआ नहीं। न दिन ढला, न रात आई, वक़्त थमा रहा, एक उम्र गुज़र जाने तक। मान लो मैंने नहीं चाहा वक़्त के साथ चलना, मैं रुका रहा, ठिठका सा, एक निष्ठुर वृक्ष की तरह। मान लो मैंने कभी महसूस नहीं किया तुम्हारा मेरे क़रीब से गुज़र जाना, जब फ़ासला हमारे दरमियां एक इंच से कम था। मान लो मैंने महसूस नहीं किया तुम्हारा मेरे पास से गुज़र जाना और हमारा एक-दूसरे को इस कदर नज़रअंदाज़ करना जिस कदर एक अजनबी अजनबी को नहीं करता। मान लो कुछ हुआ नहीं, मान लो तुम्हें नहीं देखा कभी मैने, मान लो कभी नहीं मिला तुमसे में जैसे मैने मान लिया है ठीक उस नदी की तरह, जैसे वो मान लेती है— उसकी नियति सागर में विलीन होना ही है, उसकी लकीरों में नहीं लिखा प्रेम के साथ चलना। बिना उम्मीद के फिर भी चलती है, दोनों किनारों को साथ लिए। — सूरज शर्मा

एक, दो, तीन .....

मैं आजकल सब कुछ हिस्सों में देखता हूँ। मेरा एक हिस्सा हर दिन की जद्दोजहद से जूझ रहा होता है, और दूसरा उस हिस्से को देखता है— एकटक, अपलक, एक जिज्ञासा के साथ कि वह कहाँ तक जाएगा! यह अजीब है बेहद अजीब है कि मैं खुद को टुकड़ों में देख सकता हूँ—एक, दो, तीन, और न जाने कितने हिस्से, जो उगते सूरज के साथ अपना आकार लेते हैं और शाम के अंधकार में विलीन हो जाते हैं। फिर, कुछ हिस्सों को खुद को एक सुकून भरी नींद के लिए रात भर तड़पना पड़ता है। एक हिस्सा नीरस आँखें लेकर सुबह 8:30 की क्लास में जाता है, तो दूसरा 10:10 की क्लास में। चाहकर भी तुम इन हिस्सों से खुद को अलग नहीं देख सकते, इन्हें खत्म नहीं कर सकते। तुम एक हिस्से को मिटाओगे, तो दूसरा और तीसरा फिर से उभर आएगा—फिर से जीने के लिए! आह! मेरे मन की शिथिलता और आँखों का भारीपन! मेरा एक हिस्सा डूबते सूरज का पीछा करते परिंदों में खुद को ढूँढने की कोशिश करता है, तो दूसरा चलते-चलते पेड़ों की पत्तियाँ अनायास तोड़ता, मरोड़ता, और राह पर बिखेर देता है। मैं उस विशाल वृक्ष का गुनहगार हूँ, पर ये भी तो संभव है कि मेरा बार-बार उसके पास जाना और उसकी पत्तियों को तोड़...

अनंत बातें

 ये सब प्रारंभ हुआ होगा मेरी ढेर सारी आशाओं के साथ, ढेर सारे ख्वाब जो मैंने देखें होंगे किसी लालिमा सी ढलती शाम में! ये सब शुरू हुआ होगा मेरी ढेर सारी आशाओं और चंद तुम्हारी ही बातों के साथ तुम्हें सोच कर, महसूस कर मेरे प्रियतम कि इस जहां के हर इक रहस्य को खोज लेते हम साथ–साथ! किसी आँगन में गूंजती बच्चे की किलकारियों की वजहें, या अर्धरात्रि  के साए में किसी के कपोलों से बहते नीर से अनुभूत कर लेते उनकी व्यथा, पीड़ा किताबों के पृष्ठों में छुपाए प्रेम पत्रों से हम पूछ लेते किसीके गेसुओं में बंधे पुष्पों से हम जान लेते, परख लेते या किसके विरह में डबडबाई आंखों में हम पढ़ लेते कि प्रीति कितनी गहरी थी! और सुन लेते उस समस्त मौन को हम जो किन्हीं सूने हृदयों में दबके रह गया! हाँ, ये सब आरंभ हुआ होगा मेरे ही अगाध आशावाद और तुम्हारी ही चंद बातों के साथ मेरे प्रियतम मगर, उन तमाम बातों की इतिश्री महज मिलती है उस अंत तक छितरे अंधकार में या मेरे ही मन से होकर बहते निराशाओं के सैलाब में! 2022, सूरज शर्मा

सपने

हम सब अस्तित्व के लिए लड़ रहे थे उस दफा, एक हजारों की भीड़! मुझे ठीक–ठीक तो याद नही, मगर इतना पता है कि एक जंग जरूर थी! हम सब खुद को बचा लेना चाहते थे उस त्रासदी से जो हमारी नियति में शायद हमारे जन्म से पहले से अंकित कर दी गई थी! एक ओर तो मृत्यु की दिशा और दशा दोनो को बदल देने का जुनून हम सबके नेत्रों में झलक रहा था, तो वहीं दूसरी ओर, एक भय की सिरहन हमारे बदन से दौड़ पड़ी! भय किसका था? पता नहीं! मौत का, या उस अनुभूति को अनुभूत कर लेने का कि हम मरने वाले हैं! हम सब लड़ना भी चाहते थे, हमने प्रयास भी किए मगर ऐन वक्त पर उस मौत के कोहराम की भीभत्सता को देखकर हम सब भाग खड़े हुए! शायद हमारी आने वाली पीढ़ियां हमें कायर कहेगी ये ख्याल भी हमारे मस्तिष्क की दीवारों में उभरा जरूर था मगर हमने उसे भी दबा दिया एक और ख्याल की परत से — “व्यर्थ की बहादुरी दिखलाकर हम सभ्यता की विलुप्ति की वजह बनें इससे कहीं बेहतर है हम कायरों की तरह भागकर इस सभ्यता के एक अंश को बचा लें!” और हमने वही किया! वो असुर सा विशालकाय कोई बनमानुस के जैसा भयंकर अपने पैने नाखूनों में उसे दबाकर निगल गया! मैं भागा भी उसे बचाने को मगर ...

विकृति

जीवन कैद हो किसी गुफा में या किसी गहरी अंधेरी कालकोठरी में जिसकी दीवार पर दिखे अस्तित्व की क्षीण रग्ण सी परछाइयाँ! उससे परे क्या है, तुम्हें नहीं पता! हो सकता है तुम्हारी मुक्ति की लालसा ने यह जानने की अथक कोशिशें की हों मगर कुछ दायरे जिनके परे तुम कभी जा ही न सके! तुम बस कैद हो उस गुफा में अनंतकाल से—और कैद हैं तुम्हारे दिन और रातें, सुबह और शामें उसमें! तुम्हारी आत्मा में एक घुटन का एहसास है मगर तुमने दबा लिया हो उसे भी अपनी यातनाओं और कुंठाओं के साथ, अपने ही ख्वाहिशहीन और निश्चेष्ठ मन की आड़ में! तुम्हारे सीने में विकृतता के आघात इतने गहरे हो जिनसे अधिक प्रबल अन्य पीड़ा अकल्पित हो, फिर भी तुम जिए जाओ, क्योंकि तुम्हारे पास कोई और रास्ता नही है, तुम्हें बस जीना है और जिए जाना है क्योंकि मुक्ति इतनी आसान नहीं है, तुम्हें ये बात पता है! "मेरी नीद के खुलते ही एक अश्रु की बूंद का मेरी आंख से झलकना, और फिर उसका क्षणभंगुर होकर बिखर जाना— ये महज एक इत्तफाक नहीं हो सकता!” ~ सूरज शर्मा