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Showing posts from 2022

अहम

तुम अपने विचारों के इर्द-गिर्द ही शनैः-शनैः एक ऐसा ईको चैंबर बना लेते हो, जिसमें जितनी देर ठहरो, उससे बाहर निकलना उतना ही मुश्किल! तुम्हारी सच्चाई, तुम्हारी बातें, तुम्हारे सपने — सब कुछ उसी ईको चैंबर में कैद हो जाता है, तुम्हारी साँसों के साथ। अहम, जो तुम्हारी रग-रग में दौड़ रहा होता है। ऐसे झूठ, जो तुम हर दिन खुद से बोलते हो। वो तसल्ली, वो दिलाशाएं जो देकर तुम हर रात खुद को सुला लेते हो। और उन लोगों का तुम्हें validate करना, जो खुद इस चैंबर का हिस्सा हैं — ये सब तुम्हें दिन-ब-दिन और गहरे उसी चैंबर में धकेलता जाता है। बस डर इस बात का है कि जिस दिन तुम्हारा हक़ीक़त से सामना होगा, ये सब बिखर जाएगा। “1. बच्चे में डेवलपमेंटल डिले (developmental delay) है। फिर भी वह एक आम और अच्छी ज़िंदगी जी रहा है। दिन ब दिन जीना उसे कुछ ख़ास मुश्किल नहीं लगता! 2. ये क्या है? आम ज़िंदगी जी रहा है? मैं तो जीनियस हूँ। मुझे तो बहुत कुछ करना है, विश्व के उस शिखर पर पहुँचना है, जिसे शायद आज तक किसी ने हासिल नहीं किया हो।” तुम उन्हीं भ्रमों में सालों तक भटकते रहते हो। क्या पता, उम्र भर भटकते रहो और फिर भी मुक्त...

अनंत बातें

 ये सब प्रारंभ हुआ होगा मेरी ढेर सारी आशाओं के साथ, ढेर सारे ख्वाब जो मैंने देखें होंगे किसी लालिमा सी ढलती शाम में! ये सब शुरू हुआ होगा मेरी ढेर सारी आशाओं और चंद तुम्हारी ही बातों के साथ तुम्हें सोच कर, महसूस कर मेरे प्रियतम कि इस जहां के हर इक रहस्य को खोज लेते हम साथ–साथ! किसी आँगन में गूंजती बच्चे की किलकारियों की वजहें, या अर्धरात्रि  के साए में किसी के कपोलों से बहते नीर से अनुभूत कर लेते उनकी व्यथा, पीड़ा किताबों के पृष्ठों में छुपाए प्रेम पत्रों से हम पूछ लेते किसीके गेसुओं में बंधे पुष्पों से हम जान लेते, परख लेते या किसके विरह में डबडबाई आंखों में हम पढ़ लेते कि प्रीति कितनी गहरी थी! और सुन लेते उस समस्त मौन को हम जो किन्हीं सूने हृदयों में दबके रह गया! हाँ, ये सब आरंभ हुआ होगा मेरे ही अगाध आशावाद और तुम्हारी ही चंद बातों के साथ मेरे प्रियतम मगर, उन तमाम बातों की इतिश्री महज मिलती है उस अंत तक छितरे अंधकार में या मेरे ही मन से होकर बहते निराशाओं के सैलाब में! 2022, सूरज शर्मा

सपने

हम सब अस्तित्व के लिए लड़ रहे थे उस दफा, एक हजारों की भीड़! मुझे ठीक–ठीक तो याद नही, मगर इतना पता है कि एक जंग जरूर थी! हम सब खुद को बचा लेना चाहते थे उस त्रासदी से जो हमारी नियति में शायद हमारे जन्म से पहले से अंकित कर दी गई थी! एक ओर तो मृत्यु की दिशा और दशा दोनो को बदल देने का जुनून हम सबके नेत्रों में झलक रहा था, तो वहीं दूसरी ओर, एक भय की सिरहन हमारे बदन से दौड़ पड़ी! भय किसका था? पता नहीं! मौत का, या उस अनुभूति को अनुभूत कर लेने का कि हम मरने वाले हैं! हम सब लड़ना भी चाहते थे, हमने प्रयास भी किए मगर ऐन वक्त पर उस मौत के कोहराम की भीभत्सता को देखकर हम सब भाग खड़े हुए! शायद हमारी आने वाली पीढ़ियां हमें कायर कहेगी ये ख्याल भी हमारे मस्तिष्क की दीवारों में उभरा जरूर था मगर हमने उसे भी दबा दिया एक और ख्याल की परत से — “व्यर्थ की बहादुरी दिखलाकर हम सभ्यता की विलुप्ति की वजह बनें इससे कहीं बेहतर है हम कायरों की तरह भागकर इस सभ्यता के एक अंश को बचा लें!” और हमने वही किया! वो असुर सा विशालकाय कोई बनमानुस के जैसा भयंकर अपने पैने नाखूनों में उसे दबाकर निगल गया! मैं भागा भी उसे बचाने को मगर ...

विकृति

जीवन कैद हो किसी गुफा में या किसी गहरी अंधेरी कालकोठरी में जिसकी दीवार पर दिखे अस्तित्व की क्षीण रग्ण सी परछाइयाँ! उससे परे क्या है, तुम्हें नहीं पता! हो सकता है तुम्हारी मुक्ति की लालसा ने यह जानने की अथक कोशिशें की हों मगर कुछ दायरे जिनके परे तुम कभी जा ही न सके! तुम बस कैद हो उस गुफा में अनंतकाल से—और कैद हैं तुम्हारे दिन और रातें, सुबह और शामें उसमें! तुम्हारी आत्मा में एक घुटन का एहसास है मगर तुमने दबा लिया हो उसे भी अपनी यातनाओं और कुंठाओं के साथ, अपने ही ख्वाहिशहीन और निश्चेष्ठ मन की आड़ में! तुम्हारे सीने में विकृतता के आघात इतने गहरे हो जिनसे अधिक प्रबल अन्य पीड़ा अकल्पित हो, फिर भी तुम जिए जाओ, क्योंकि तुम्हारे पास कोई और रास्ता नही है, तुम्हें बस जीना है और जिए जाना है क्योंकि मुक्ति इतनी आसान नहीं है, तुम्हें ये बात पता है! "मेरी नीद के खुलते ही एक अश्रु की बूंद का मेरी आंख से झलकना, और फिर उसका क्षणभंगुर होकर बिखर जाना— ये महज एक इत्तफाक नहीं हो सकता!” ~ सूरज शर्मा