विकृति

जीवन कैद हो किसी गुफा में या किसी गहरी अंधेरी कालकोठरी में जिसकी दीवार पर दिखे अस्तित्व की क्षीण रग्ण सी परछाइयाँ! उससे परे क्या है, तुम्हें नहीं पता! हो सकता है तुम्हारी मुक्ति की लालसा ने यह जानने की अथक कोशिशें की हों मगर कुछ दायरे जिनके परे तुम कभी जा ही न सके! तुम बस कैद हो उस गुफा में अनंतकाल से—और कैद हैं तुम्हारे दिन और रातें, सुबह और शामें उसमें! तुम्हारी आत्मा में एक घुटन का एहसास है मगर तुमने दबा लिया हो उसे भी अपनी यातनाओं और कुंठाओं के साथ, अपने ही ख्वाहिशहीन और निश्चेष्ठ मन की आड़ में! तुम्हारे सीने में विकृतता के आघात इतने गहरे हो जिनसे अधिक प्रबल अन्य पीड़ा अकल्पित हो, फिर भी तुम जिए जाओ, क्योंकि तुम्हारे पास कोई और रास्ता नही है, तुम्हें बस जीना है और जिए जाना है क्योंकि मुक्ति इतनी आसान नहीं है, तुम्हें ये बात पता है!

"मेरी नीद के खुलते ही एक अश्रु की बूंद का मेरी आंख से झलकना, और फिर उसका क्षणभंगुर होकर बिखर जाना— ये महज एक इत्तफाक नहीं हो सकता!”


~ सूरज शर्मा

Comments

Popular posts from this blog

The Truth Is

एक, दो, तीन .....

उम्मीद नहीं