सपने

हम सब अस्तित्व के लिए लड़ रहे थे उस दफा, एक हजारों की भीड़! मुझे ठीक–ठीक तो याद नही, मगर इतना पता है कि एक जंग जरूर थी! हम सब खुद को बचा लेना चाहते थे उस त्रासदी से जो हमारी नियति में शायद हमारे जन्म से पहले से अंकित कर दी गई थी! एक ओर तो मृत्यु की दिशा और दशा दोनो को बदल देने का जुनून हम सबके नेत्रों में झलक रहा था, तो वहीं दूसरी ओर, एक भय की सिरहन हमारे बदन से दौड़ पड़ी! भय किसका था? पता नहीं! मौत का, या उस अनुभूति को अनुभूत कर लेने का कि हम मरने वाले हैं! हम सब लड़ना भी चाहते थे, हमने प्रयास भी किए मगर ऐन वक्त पर उस मौत के कोहराम की भीभत्सता को देखकर हम सब भाग खड़े हुए! शायद हमारी आने वाली पीढ़ियां हमें कायर कहेगी ये ख्याल भी हमारे मस्तिष्क की दीवारों में उभरा जरूर था मगर हमने उसे भी दबा दिया एक और ख्याल की परत से — “व्यर्थ की बहादुरी दिखलाकर हम सभ्यता की विलुप्ति की वजह बनें इससे कहीं बेहतर है हम कायरों की तरह भागकर इस सभ्यता के एक अंश को बचा लें!” और हमने वही किया! वो असुर सा विशालकाय कोई बनमानुस के जैसा भयंकर अपने पैने नाखूनों में उसे दबाकर निगल गया! मैं भागा भी उसे बचाने को मगर मेरे लड़खड़ाते कदमों ने मुझे थाम लिया! और मैं भी भाग खड़ा हुआ मेरी शिथिलता के साथ जैसे सब भागे थे उस दफा मौत के कोहराम से! एक रेलगाड़ी ‘पौं–पौं–पौं’ की ध्वनि के साथ प्लेटफार्म की ओर तेजी से आने लगी, इसका अहसास मुझे उन रेल की पटरियों की गड़गाहट से हो चुका था! हजारों की भीड़ ढोल–नगाड़ों के साथ एक जश्न में के नशे में ओत–प्रोत होकर उन पटरियों के बीच स्वागत में एकत्रित हो चुकी थी, मानो वो भीड़ कितने अरसों से उसी रेल के आजाने की प्रतीक्षा कर रही थी! जैसे–जैसे वह रेलगाड़ी प्लेटफार्म की ओर आगे बढ़ती गई, और इसी के साथ एक हर्ष और उल्लास की लहर उन हवाओं में घुलती गई! लोग खुशी के नशे में इतने मगरुर थे कि उनको अहसास तक नही था कि वो रेलगाड़ी उन्ही की ओर दौड़ी चली आ रही है! रेलगाड़ी भीड़ के करीब आई ही थी कि लोग पटरियों से दूर हट गए, हालांकि एक बच्चा अभी भी पटरियों के बीच खड़ा हुआ था! ड्राइवर ने रेल की रफ्तार कम की और एक सज्जन पटरियों के एक और से फुर्ती के साथ दौड़ा और पटरियों के बीचों–बीच खड़े उस बच्चे को अपने आलिंगन में भरकर दूसरी और ले गया! मैने उस दफा महसूस किया था उस जंग को जो हम सबने मिलकर जीती थी!


— सूरज शर्मा

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