एक, दो, तीन .....

मैं आजकल सब कुछ हिस्सों में देखता हूँ। मेरा एक हिस्सा हर दिन की जद्दोजहद से जूझ रहा होता है, और दूसरा उस हिस्से को देखता है— एकटक, अपलक, एक जिज्ञासा के साथ कि वह कहाँ तक जाएगा! यह अजीब है बेहद अजीब है कि मैं खुद को टुकड़ों में देख सकता हूँ—एक, दो, तीन, और न जाने कितने हिस्से, जो उगते सूरज के साथ अपना आकार लेते हैं और शाम के अंधकार में विलीन हो जाते हैं। फिर, कुछ हिस्सों को खुद को एक सुकून भरी नींद के लिए रात भर तड़पना पड़ता है।

एक हिस्सा नीरस आँखें लेकर सुबह 8:30 की क्लास में जाता है, तो दूसरा 10:10 की क्लास में। चाहकर भी तुम इन हिस्सों से खुद को अलग नहीं देख सकते, इन्हें खत्म नहीं कर सकते। तुम एक हिस्से को मिटाओगे, तो दूसरा और तीसरा फिर से उभर आएगा—फिर से जीने के लिए!

आह! मेरे मन की शिथिलता और आँखों का भारीपन! मेरा एक हिस्सा डूबते सूरज का पीछा करते परिंदों में खुद को ढूँढने की कोशिश करता है, तो दूसरा चलते-चलते पेड़ों की पत्तियाँ अनायास तोड़ता, मरोड़ता, और राह पर बिखेर देता है। मैं उस विशाल वृक्ष का गुनहगार हूँ, पर ये भी तो संभव है कि मेरा बार-बार उसके पास जाना और उसकी पत्तियों को तोड़ना, उधेड़ना, उसे भी सुकून देता हो—जैसे हमें, इंसानों को, दुख और कुंठा में जीना एक अजीब-सा सुकून देता है।

कभी-कभी मैं क्लास जाने के लिए सबसे छोटा रास्ता चुनता हूँ, इसी भय के साथ कि मेरे विचारों का भँवर कहीं मुझे ही न निगल जाए, और कभी सबसे लंबा रास्ता, ताकि थोड़ा सोचने-समझने का वक्त मिल सके। ज़िंदगी भाग रही है, समय भाग रहा है— यह सब उतना ही अर्थहीन है, जितना कि अर्थहीन है मेरा यह सब लिखना, और तुम्हारा यह सब पढ़ना।

कोई ढंग का काम किया करो, यहाँ समय बर्बाद नहीं करना चाहिए!

और मेरी शिराओं में अनगिनत रसायन बह रहे हैं।

(And the chemicals are flowing through my veins.)




— सूरज शर्मा, Feb 26, 2025

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