उम्मीद नहीं
तुम्हें लौटने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, किसी भी इंसान को किसी दूसरे इंसान के लौटने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। यह अच्छी बात है कि एक वक्त बाद मिले हो, तो साथ में समय बिताओ, मगर उम्मीद मत करो किसी के लौटकर आने की। उम्मीद मत करो कि तुम मुझे फिर से मिल पाओगे या मैं तुम्हें फिर से देख सकूंगा। जिंदगी काफी नाजुक है, कभी भी टूटकर बिखर सकती है। एक वक्त बीत गया है। मैं अक्सर खुद के लिखे को पढ़ता हूँ, तो खुद पर हंसी आती है—हाँ, हंसी आती है। नादान नहीं कहना चाहिए, बेवकूफ ठीक है। इंसान की जिंदगी में एक उम्र ऐसी आती है, जिसके बाद वे बड़े होना छोड़ देते हैं। उनके विचारों की सीमाएं चरम पर पहुंच जाती हैं। उस वक्त वे जो कुछ लिखते हैं, वह उनकी वह रचना होती है जिसे वे अपने बाकी लिखे की तुलना में सबसे बेहतर कह सकते हैं। लेकिन उससे आगे कुछ नहीं है, और यह कई सारी सीमाओं और बंदिशों के साथ आता है। तुम वही सारे शब्दों, ख्यालों और विचारों के इर्द-गिर्द घूमते रहते हो। वह रास्ता सीमाहीन नहीं होता। तुम उससे बेहतर नहीं लिख सकते।
मेरी सालों से इच्छा थी किसी सीमाहीन रास्ते पर खुद को गुम कर देने की, मगर अब लगता है कि यह कभी संभव नहीं हो पाएगा। हर इंसान की जिंदगी में एक उम्र के बाद ठहराव आता है, जैसे कोई पर्वतारोही माउंट एवरेस्ट पर चढ़ते-चढ़ते अंतिम शिखर पर पहुंचकर महसूस करता है कि इससे आगे कुछ नहीं। इससे आगे कुछ भी जीतने के लिए नहीं बचा, अगर हम इसे उसकी जीत मानें—जो कि हमें माननी चाहिए। अब उसे उतरना है। उसे इसी सत्य में खुद को संतुष्ट करना होगा। यही ठहराव जिंदगी में भी आता है। और मृत्यु इस जीवन का परम सत्य है, जो उस ठहराव से पहले भी आ सकती है और उसके बाद भी। तुम उसे टाल नहीं सकते, न मैं। यह कब आएगी, मुझे नहीं पता। क्या पता मेरे स्टेशन पर उतरते ही एक और स्टंप्ड हो जाएगा? क्या पता यह ट्रेन पलट जाए या किसी दूसरी ट्रेन से टकरा जाए? क्या पता इस ट्रेन का यही एक डिब्बा टूटकर बिखर जाए? क्या पता कॉलेज जाते वक्त किसी सड़क दुर्घटना में मर जाऊं? कुछ भी हो सकता है। संभावनाएं कम हैं, मगर हैं तो सही।
मैं तुमसे मिला, शायद जी भर के देखा, शायद नहीं देखा। कुछ शब्द और कहने थे, कुछ वक्त और बिताना था। पर उसके बाद भी मैं उम्मीद नहीं रखता।
"हाँ, मुझे मई में छुट्टी मिलेगी, पर मुझे नहीं पता कि मैं मई में वापस आऊंगा या नहीं।"
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