मान लो

मान लो कुछ हुआ नहीं,
मान लो कभी देखा नहीं तुम्हे मैने,
मान लो कभी मिला नहीं मैं तुमसे,
मान लो मैं नहीं गया सपनों के शहर कभी,
मान लो मैंने कभी गौर नहीं किया तुम्हारी शरारतों पर, चंचलता पर,
मान लो नहीं आया खयाल मुझे
— कभी तुम्हें प्यार से गले लगाने का।
मान लो कुछ हुआ नहीं।

न दिन ढला, न रात आई,
वक़्त थमा रहा, एक उम्र गुज़र जाने तक।

मान लो मैंने नहीं चाहा वक़्त के साथ चलना,
मैं रुका रहा, ठिठका सा,
एक निष्ठुर वृक्ष की तरह।

मान लो मैंने कभी महसूस नहीं किया
तुम्हारा मेरे क़रीब से गुज़र जाना,
जब फ़ासला हमारे दरमियां एक इंच से कम था।
मान लो मैंने महसूस नहीं किया
तुम्हारा मेरे पास से गुज़र जाना
और हमारा एक-दूसरे को इस कदर नज़रअंदाज़ करना
जिस कदर एक अजनबी अजनबी को नहीं करता।

मान लो कुछ हुआ नहीं,
मान लो तुम्हें नहीं देखा कभी मैने,
मान लो कभी नहीं मिला तुमसे में
जैसे मैने मान लिया है ठीक उस नदी की तरह,
जैसे वो मान लेती है—
उसकी नियति सागर में विलीन होना ही है,
उसकी लकीरों में नहीं लिखा प्रेम के साथ चलना।
बिना उम्मीद के फिर भी चलती है,
दोनों किनारों को साथ लिए।

— सूरज शर्मा

Comments