उनींदी आंखें

उनींदी आंखें,
कुछ सपने संजोए हुए,
जो पनपने लगे हैं,
संयोग से,
देखा था जिन्हे़ं
कभी खुली आंखों से!

जिद्दी दिल थमता कहां?
परवाज़ चढ़ाना है इसको,
या उड़ना है खुले गगन में,
पंख फैलाए,
मानो सारे जहां के आयाम को नापना हो
या जानना हो उस अज्ञात को
जो अरसों तक अज्ञात ही रहा!

उस दूर आकाश में आज
चाद की चमक भी कुछ तेज़ सी है
जिसमें चमकने लगी है
उनींदी आंखें,
और आंखों में कुछ रोशन सपने!

दादी कहती थीं - टूटता तारा
लोगों की ख्वाइशें पूरी कर जाता है,
मालूम नहीं कहां तक सच्चाई है इसमें,
बस इतनी सी तमन्ना है,
कि कल ये चांद रहे या न रहे
मगर उनींदी आंखों में
मेरे सपनों की चमक कायम रहे!


~सूरज शर्मा

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