स्मृतियाँ

अतीत की लकीरें,
अनायस ही खींचती चली जातीं,
कोरे पन्नों पर,

कुछ राज बयां करने,
किन्हीं गलियों में दौड़ती यादों को,
अनुभूतियों को शब्दों में पिरोने की चाहत में

वक्त की लकीरें खींचती चली जातीं,
और सजीव होने लगते हैं,
कुछ एहसास, स्मृतियाँ,
किसी का खोया हुआ व्यक्तित्व,
खोया हुआ अस्तित्व!!!!

 

 ~ सूरज शर्मा

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