ख्वाहिशें

(1) 21.10.2021

मुझे बेहद सुकून देता है
खुले आसमान के नीचे बैठना,
जब मेरे विचारों की श्रृंखला
मेरी ख्वाहिशों के दायरे से
परे निकलकर
सुदूर ब्रह्मांड में
निकल पड़ती है
अपने कौतूहल की
पताका थामे
कुछ जानने
कुछ परखने
दूर तारों को छूने
और कभी बरसात में
दमकती दामिनी से
इसकी चंचलता का राज
पूछने
मेरे विचारों की श्रृंखला,
और हां, मुझे तो बेहद पसंद है
इन अंधेरी रातों में
खुले गगन के नीचे बैठना!!


(2) 03.09.2021

अक्सर दिल करता है,
आकाश में बनी इन पगडंडियों पे चलकर,
कहीं दूर निकल जाऊँ मैं भी इतना
कि शायद इस दुनिया का शोर
मेरे कानो तक न पहुंच सके!

ये आकाश भी तो अकेला है ना,
प्रतीक्षा में किसी मुसाफिर की,
इसलिए तो सजा दी हैं
केसरिया रंग की ये पगडंडियाँ
जिन पर चलकर कोई भटका हुआ पथिक
आ सके उसके अकेलेपन को दूर करने,
जिसके साथ ये बाँट सके अपने सारे ग़मों को! 


~सूरज शर्मा

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