सागर सा गहरा
कुछ है जो
इस मंद पवन में आकर ठहरा है,
कुछ तो उलझा-उलझा सा,
या सागर सा गहरा है!
पेड़ों की पत्तियाँ,
सहमे-सहमे से गिरती,
मंद पवन झोकों में घुलके,
मीलों दूरी तक चलतीं,
ये बागों के पुष्प सुनहरे,
जिनपे, भँवरे मधुवन की आश में बैठें है,
अपनी ही मुस्कान के पिछे,
एक दर्द छिपाए रखे हैं,
चकवा-चकवी का जोड़ा,
क्रंदन स्वर में अब गाता है,
वसंत के इंतजार में उसका,
कंठ जो सूखा जाता है,
बारिश की बूंदों की सरगम,
ताल से ताल मिलती है,
उनकी प्यास बुझाने को,
खुद निसार हो जाती है,
चारु-चन्द्र की ये किरणें,
वसुधा दामन में गिरती है,
देख दृस्य खामोश रागिनी,
प्रफुल्ल से सिसक पड़ती है!
सागर की चंचल सी लहरें,
शाहिल से मिलने आतीं हैं,
एक लम्हा साथ बिताकर वे भी,
दूर कहीं गुम जातीं हैं!
इस गुमने-मिलने की क्रीड़ा में,
प्रेम ही आकर ठहरा है,
जो है तो उलझा-उलझा सा,
मगर सागर के जितना गहरा है!
~ सूरज शर्मा
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