गुलाबी शाम
आजाद परिंदा अंबर का मैं और
किसी गुलाबी शाम सी तुम,
मेरे अधूरे नाम की पूर्णता,
और उसकी पहचान सी तुम,
कुछ ख्वाइशों लिए उड़ता में,
उन ख्वाइशों की अज़ान सी तुम,
आजाद परिंन्दा अंवर का मैं
और कोई गुलाबी शाम सी तुम!
सहर्ष विकल घुलती है पवन,
जैसे मिला तुम्हीं से हो नवजीवन,
उस जीवन का आधार सी तुम,
आजाद परिंदा बरसों से में,
और किसी गुलाबी शाम सी तुम!
~ SunShine
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