अंतहीन यात्रा




कोई ढलती सी शाम और

क्षितिज पर बिखरी लाली,

शिथिल दिवाकर के वापस

अपने घर की राह पर

लौटने का संकेत करती,

अनकहे से शब्दों में

उसकी मीलों की यात्रा का

राज बयान करती

कोई ढलती शाम,

और आकाश में बिखरी लाली!


एक संशय

हर चीज के दृश्यहीन हो जाने के का

तमश की बिखरी पंखों में खो जाने का

मगर

चांद आकर बटोर लेता पंखों को

बसुधा के दामन से,

जैसे दिनकर बटोर लेता तुहिन को

शीत भोर में तरुओं से!

और वापस लौट आते हैं तारे

आठ प्रहरों के प्रवास काल के उपरांत!

टिमटिमाते तारे,

मुस्कुराते तारे,

झिलमिलाते तारे,

तारे ही तारे,

जो बिखरे है हमारी मंदाकिनी

के अंतिम छोर तक,

या उससे भी परे!

बस तारे ही तारे

उस रागिनी के गोद में,

किसी मुसाफिर का मार्गदर्शक बन जाते

किसी मुझे से भटके को राह दिखा जाते!


अंतत:

इस यात्रा के अंतहीन बनने का सफर

किसी ढलती सी शाम और

नभ में बिखरी लाली

से शुरू होकर

अनंत काल तक

चलता ही रहता,

ठीक मेरे कमरे की दीवार पर टंगी

उस घड़ी की सुई के जैसे

"टिक_टिक_टिक........

निरंतर

अनवरत!



~सूरज शर्मा

Comments

Popular posts from this blog

उम्मीद नहीं

एक, दो, तीन .....

सपने