अहम
तुम अपने विचारों के इर्द-गिर्द ही शनैः-शनैः एक ऐसा ईको चैंबर बना लेते हो, जिसमें जितनी देर ठहरो, उससे बाहर निकलना उतना ही मुश्किल! तुम्हारी सच्चाई, तुम्हारी बातें, तुम्हारे सपने — सब कुछ उसी ईको चैंबर में कैद हो जाता है, तुम्हारी साँसों के साथ।
अहम, जो तुम्हारी रग-रग में दौड़ रहा होता है। ऐसे झूठ, जो तुम हर दिन खुद से बोलते हो। वो तसल्ली, वो दिलाशाएं जो देकर तुम हर रात खुद को सुला लेते हो। और उन लोगों का तुम्हें validate करना, जो खुद इस चैंबर का हिस्सा हैं — ये सब तुम्हें दिन-ब-दिन और गहरे उसी चैंबर में धकेलता जाता है। बस डर इस बात का है कि जिस दिन तुम्हारा हक़ीक़त से सामना होगा, ये सब बिखर जाएगा।
“1. बच्चे में डेवलपमेंटल डिले (developmental delay) है। फिर भी वह एक आम और अच्छी ज़िंदगी जी रहा है। दिन ब दिन जीना उसे कुछ ख़ास मुश्किल नहीं लगता!
2. ये क्या है? आम ज़िंदगी जी रहा है? मैं तो जीनियस हूँ। मुझे तो बहुत कुछ करना है, विश्व के उस शिखर पर पहुँचना है, जिसे शायद आज तक किसी ने हासिल नहीं किया हो।”
तुम उन्हीं भ्रमों में सालों तक भटकते रहते हो। क्या पता, उम्र भर भटकते रहो और फिर भी मुक्ति न मिले।
एक लड़का समय के साथ भागते-भागते मर गया। भागना मुक्ति नहीं हो सकती। उम्र भर भागते रहना मुक्ति नहीं हो सकती। संयम के साथ जीना ही मुक्ति है। समय के साथ चलना ही मुक्ति है! संयम कैसे आएगा, पता नहीं। ढूँढ़ रहा हूँ।
शायद यह मान लेने से कि it's alright to be ordinary — आम होना ठीक है, आम होना और संयम से चलना ठीक है।
यह मान लेना कि तुम जो आज कर रहे हो, वह कल भी करोगे — इसका कोई ख़ास अर्थ नहीं है। जब तुम रात को सोने जाओ और यह ख़याल कि शायद कल सुबह तुम नींद से कभी न उठो, तुम्हें बेचैन न करे, तब समझ जाना कि शायद यही मुक्ति की राह है!
हमने खुद को अपने-अपने अहम में इतना झोंक दिया है कि दो कदम आगे हमें कुछ दिखाई नहीं देता।
ख़ैर, तुम अपना अहम रख लो। मैं अपने अहम को किसी दिन दफ़ना दूँगा!
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