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स्मृतियाँ

अतीत की लकीरें, अनायस ही खींचती चली जातीं, कोरे पन्नों पर, कुछ राज बयां करने, किन्हीं गलियों में दौड़ती यादों को, अनुभूतियों को शब्दों में पिरोने की चाहत में वक्त की लकीरें खींचती चली जातीं, और सजीव होने लगते हैं, कुछ एहसास, स्मृतियाँ, किसी का खोया हुआ व्यक्तित्व, खोया हुआ अस्तित्व!!!!    ~ सूरज शर्मा

ख्वाहिशें

(1) 21.10.2021 मुझे बेहद सुकून देता है खुले आसमान के नीचे बैठना, जब मेरे विचारों की श्रृंखला मेरी ख्वाहिशों के दायरे से परे निकलकर सुदूर ब्रह्मांड में निकल पड़ती है अपने कौतूहल की पताका थामे कुछ जानने कुछ परखने दूर तारों को छूने और कभी बरसात में दमकती दामिनी से इसकी चंचलता का राज पूछने मेरे विचारों की श्रृंखला, और हां, मुझे तो बेहद पसंद है इन अंधेरी रातों में खुले गगन के नीचे बैठना!! (2) 03.09.2021 अक्सर दिल करता है, आकाश में बनी इन पगडंडियों पे चलकर, कहीं दूर निकल जाऊँ मैं भी इतना कि शायद इस दुनिया का शोर मेरे कानो तक न पहुंच सके! ये आकाश भी तो अकेला है ना, प्रतीक्षा में किसी मुसाफिर की, इसलिए तो सजा दी हैं केसरिया रंग की ये पगडंडियाँ जिन पर चलकर कोई भटका हुआ पथिक आ सके उसके अकेलेपन को दूर करने, जिसके साथ ये बाँट सके अपने सारे ग़मों को!  ~सूरज शर्मा

उनींदी आंखें

उनींदी आंखें, कुछ सपने संजोए हुए, जो पनपने लगे हैं, संयोग से, देखा था जिन्हे़ं कभी खुली आंखों से! जिद्दी दिल थमता कहां? परवाज़ चढ़ाना है इसको, या उड़ना है खुले गगन में, पंख फैलाए, मानो सारे जहां के आयाम को नापना हो या जानना हो उस अज्ञात को जो अरसों तक अज्ञात ही रहा! उस दूर आकाश में आज चाद की चमक भी कुछ तेज़ सी है जिसमें चमकने लगी है उनींदी आंखें, और आंखों में कुछ रोशन सपने! दादी कहती थीं - टूटता तारा लोगों की ख्वाइशें पूरी कर जाता है, मालूम नहीं कहां तक सच्चाई है इसमें, बस इतनी सी तमन्ना है, कि कल ये चांद रहे या न रहे मगर उनींदी आंखों में मेरे सपनों की चमक कायम रहे! ~सूरज शर्मा

अंतहीन यात्रा

कोई ढलती सी शाम और क्षितिज पर बिखरी लाली, शिथिल दिवाकर के वापस अपने घर की राह पर लौटने का संकेत करती, अनकहे से शब्दों में उसकी मीलों की यात्रा का राज बयान करती कोई ढलती शाम, और आकाश में बिखरी लाली! एक संशय हर चीज के दृश्यहीन हो जाने के का तमश की बिखरी पंखों में खो जाने का मगर चांद आकर बटोर लेता पंखों को बसुधा के दामन से, जैसे दिनकर बटोर लेता तुहिन को शीत भोर में तरुओं से! और वापस लौट आते हैं तारे आठ प्रहरों के प्रवास काल के उपरांत! टिमटिमाते तारे, मुस्कुराते तारे, झिलमिलाते तारे, तारे ही तारे, जो बिखरे है हमारी मंदाकिनी के अंतिम छोर तक, या उससे भी परे! बस तारे ही तारे उस रागिनी के गोद में, किसी मुसाफिर का मार्गदर्शक बन जाते किसी मुझे से भटके को राह दिखा जाते! अंतत: इस यात्रा के अंतहीन बनने का सफर किसी ढलती सी शाम और नभ में बिखरी लाली से शुरू होकर अनंत काल तक चलता ही रहता, ठीक मेरे कमरे की दीवार पर टंगी उस घड़ी की सुई के जैसे "टिक_टिक_टिक........ निरंतर अनवरत! ~सूरज शर्मा

तुम

उन सिमटती सी लहरों से जुड़ा है किनारों का एक अटूट रिश्ता, इसलिए तो वो लहरें गर तीव्र रोष में निकल पड़ती है कभी, किनारों को पार कर, कहीं दूर निकल की ज़िद में तब थाम लेता है, वो किनारा उन लहरों को संयम से, प्रेम से, एक अजीब सी बेचैनी के साथ मानो उन्हें कहीं दूर जाने ही नहीं देना चाहता, खुद से! मेरे मन की चंचलता भी भिन्न तो नहीं, उन लहरों की ज़िद से, और जब भी निकलता हूं, किसी अनजानी राह पर, सोचकर कि दूर चला जाऊँ तुमसे, कहीं दूर, बहुत दूर, इतना कि कभी लौटने का मन भी करें, तो खुद को गुमराह ही पाऊँ, मगर हर इक राह पर, तुम्हारी मौजूदगी ही तो होती है और थाम लेती हो तुम, मुझे, हर बार ही, ठीक वैसे, जैसे वो किनारा थाम लेता है, उन लहरों की चंचलता-चपलता को संयम से, प्रेम से!   ~ सूरज शर्मा           

सागर सा गहरा

कुछ है जो इस मंद पवन में आकर ठहरा है, कुछ तो उलझा-उलझा सा, या सागर सा गहरा है! पेड़ों की पत्तियाँ, सहमे-सहमे से गिरती, मंद पवन झोकों में घुलके, मीलों दूरी तक चलतीं, ये बागों के पुष्प सुनहरे, जिनपे, भँवरे मधुवन की आश में बैठें है, अपनी ही मुस्कान के पिछे, एक दर्द छिपाए रखे हैं, चकवा-चकवी का जोड़ा, क्रंदन स्वर में अब गाता है, वसंत के इंतजार में उसका, कंठ जो सूखा जाता है, बारिश की बूंदों की सरगम, ताल से ताल मिलती है, उनकी प्यास बुझाने को, खुद निसार हो जाती है, चारु-चन्द्र की ये किरणें, वसुधा दामन में गिरती है, देख दृस्य खामोश रागिनी, प्रफुल्ल से सिसक पड़ती है! सागर की चंचल सी लहरें, शाहिल से मिलने आतीं हैं, एक लम्हा साथ बिताकर वे भी, दूर कहीं गुम जातीं हैं! इस गुमने-मिलने की क्रीड़ा में, प्रेम ही आकर ठहरा है, जो है तो उलझा-उलझा सा, मगर सागर के जितना गहरा है!   ~ सूरज शर्मा   

गुलाबी शाम

आजाद परिंदा अंबर का मैं और किसी गुलाबी शाम सी तुम, मेरे अधूरे नाम की पूर्णता, और उसकी पहचान सी तुम, कुछ ख्वाइशों लिए उड़ता में, उन ख्वाइशों की अज़ान सी तुम, आजाद परिंन्दा अंवर का मैं और कोई गुलाबी शाम सी तुम! सहर्ष विकल घुलती है पवन, जैसे मिला तुम्हीं से हो नवजीवन, उस जीवन का आधार सी तुम, आजाद परिंदा बरसों से में, और किसी गुलाबी शाम सी तुम!   ~ SunShine