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एक, दो, तीन .....

मैं आजकल सब कुछ हिस्सों में देखता हूँ। मेरा एक हिस्सा हर दिन की जद्दोजहद से जूझ रहा होता है, और दूसरा उस हिस्से को देखता है— एकटक, अपलक, एक जिज्ञासा के साथ कि वह कहाँ तक जाएगा! यह अजीब है बेहद अजीब है कि मैं खुद को टुकड़ों में देख सकता हूँ—एक, दो, तीन, और न जाने कितने हिस्से, जो उगते सूरज के साथ अपना आकार लेते हैं और शाम के अंधकार में विलीन हो जाते हैं। फिर, कुछ हिस्सों को खुद को एक सुकून भरी नींद के लिए रात भर तड़पना पड़ता है। एक हिस्सा नीरस आँखें लेकर सुबह 8:30 की क्लास में जाता है, तो दूसरा 10:10 की क्लास में। चाहकर भी तुम इन हिस्सों से खुद को अलग नहीं देख सकते, इन्हें खत्म नहीं कर सकते। तुम एक हिस्से को मिटाओगे, तो दूसरा और तीसरा फिर से उभर आएगा—फिर से जीने के लिए! आह! मेरे मन की शिथिलता और आँखों का भारीपन! मेरा एक हिस्सा डूबते सूरज का पीछा करते परिंदों में खुद को ढूँढने की कोशिश करता है, तो दूसरा चलते-चलते पेड़ों की पत्तियाँ अनायास तोड़ता, मरोड़ता, और राह पर बिखेर देता है। मैं उस विशाल वृक्ष का गुनहगार हूँ, पर ये भी तो संभव है कि मेरा बार-बार उसके पास जाना और उसकी पत्तियों को तोड़...

अनंत बातें

 ये सब प्रारंभ हुआ होगा मेरी ढेर सारी आशाओं के साथ, ढेर सारे ख्वाब जो मैंने देखें होंगे किसी लालिमा सी ढलती शाम में! ये सब शुरू हुआ होगा मेरी ढेर सारी आशाओं और चंद तुम्हारी ही बातों के साथ तुम्हें सोच कर, महसूस कर मेरे प्रियतम कि इस जहां के हर इक रहस्य को खोज लेते हम साथ–साथ! किसी आँगन में गूंजती बच्चे की किलकारियों की वजहें, या अर्धरात्रि  के साए में किसी के कपोलों से बहते नीर से अनुभूत कर लेते उनकी व्यथा, पीड़ा किताबों के पृष्ठों में छुपाए प्रेम पत्रों से हम पूछ लेते किसीके गेसुओं में बंधे पुष्पों से हम जान लेते, परख लेते या किसके विरह में डबडबाई आंखों में हम पढ़ लेते कि प्रीति कितनी गहरी थी! और सुन लेते उस समस्त मौन को हम जो किन्हीं सूने हृदयों में दबके रह गया! हाँ, ये सब आरंभ हुआ होगा मेरे ही अगाध आशावाद और तुम्हारी ही चंद बातों के साथ मेरे प्रियतम मगर, उन तमाम बातों की इतिश्री महज मिलती है उस अंत तक छितरे अंधकार में या मेरे ही मन से होकर बहते निराशाओं के सैलाब में! 2022, सूरज शर्मा

सपने

हम सब अस्तित्व के लिए लड़ रहे थे उस दफा, एक हजारों की भीड़! मुझे ठीक–ठीक तो याद नही, मगर इतना पता है कि एक जंग जरूर थी! हम सब खुद को बचा लेना चाहते थे उस त्रासदी से जो हमारी नियति में शायद हमारे जन्म से पहले से अंकित कर दी गई थी! एक ओर तो मृत्यु की दिशा और दशा दोनो को बदल देने का जुनून हम सबके नेत्रों में झलक रहा था, तो वहीं दूसरी ओर, एक भय की सिरहन हमारे बदन से दौड़ पड़ी! भय किसका था? पता नहीं! मौत का, या उस अनुभूति को अनुभूत कर लेने का कि हम मरने वाले हैं! हम सब लड़ना भी चाहते थे, हमने प्रयास भी किए मगर ऐन वक्त पर उस मौत के कोहराम की भीभत्सता को देखकर हम सब भाग खड़े हुए! शायद हमारी आने वाली पीढ़ियां हमें कायर कहेगी ये ख्याल भी हमारे मस्तिष्क की दीवारों में उभरा जरूर था मगर हमने उसे भी दबा दिया एक और ख्याल की परत से — “व्यर्थ की बहादुरी दिखलाकर हम सभ्यता की विलुप्ति की वजह बनें इससे कहीं बेहतर है हम कायरों की तरह भागकर इस सभ्यता के एक अंश को बचा लें!” और हमने वही किया! वो असुर सा विशालकाय कोई बनमानुस के जैसा भयंकर अपने पैने नाखूनों में उसे दबाकर निगल गया! मैं भागा भी उसे बचाने को मगर ...

विकृति

जीवन कैद हो किसी गुफा में या किसी गहरी अंधेरी कालकोठरी में जिसकी दीवार पर दिखे अस्तित्व की क्षीण रग्ण सी परछाइयाँ! उससे परे क्या है, तुम्हें नहीं पता! हो सकता है तुम्हारी मुक्ति की लालसा ने यह जानने की अथक कोशिशें की हों मगर कुछ दायरे जिनके परे तुम कभी जा ही न सके! तुम बस कैद हो उस गुफा में अनंतकाल से—और कैद हैं तुम्हारे दिन और रातें, सुबह और शामें उसमें! तुम्हारी आत्मा में एक घुटन का एहसास है मगर तुमने दबा लिया हो उसे भी अपनी यातनाओं और कुंठाओं के साथ, अपने ही ख्वाहिशहीन और निश्चेष्ठ मन की आड़ में! तुम्हारे सीने में विकृतता के आघात इतने गहरे हो जिनसे अधिक प्रबल अन्य पीड़ा अकल्पित हो, फिर भी तुम जिए जाओ, क्योंकि तुम्हारे पास कोई और रास्ता नही है, तुम्हें बस जीना है और जिए जाना है क्योंकि मुक्ति इतनी आसान नहीं है, तुम्हें ये बात पता है! "मेरी नीद के खुलते ही एक अश्रु की बूंद का मेरी आंख से झलकना, और फिर उसका क्षणभंगुर होकर बिखर जाना— ये महज एक इत्तफाक नहीं हो सकता!” ~ सूरज शर्मा

अरसों की बातें

और वहां से शुरू होगा एक और सफर! कैसा महसूस होता है जब हम सब कुछ जीत लेते हैं— यह धरती, आकाश और पाताल! जब ये सरसराती हवाएं, ये वृक्ष, वन – बापी और ब्रह्मांड का प्रत्येक अंग हमारे अधीन हो जाता है! दिन ढलेगा, रात आएगी और फिर एक नई सुबह, लेकिन कोई अंतर नहीं पड़ेगा हमारे सब कुछ जीत लेने या हार जाने से! शून्यता नैसर्गिक है, जिसे न तुम नकार सकती हो और न मैं! अपने जिस अस्तित्व की खोज में, जिस उत्साह और सब कुछ जीत लेने की जिस ख्वाहिश से यहां इतनी दूर तक आया हूं मैं, वे तीनों उस वृक्ष के नीचे उस अर्थहीनता की चादर ओढ़े बैठे हैं! समय खुद में अरसों की उस निरंकुशता में लिप्त एक लयबद्ध तरीके से गतिमान है, लेकिन परिवर्तन कुछ भी नहीं! मैंने सब कुछ जीत लिया है— तुम, यह धरती, और अनंत तक फैला यह समस्त ब्योम— लेकिन बदला कुछ नहीं! वर्षों बीत चुके हैं... हमारे दरमियान उस आखिरी बात को हुए, जब तुमने कहा था… तुमने कहा था कि एक दिन मैं सब कुछ जीत लूंगा! तुम्हें पता है, मैंने सब कुछ जीत लिया है! लेकिन इस जीत को सहन करना, और सहन करते रहना, मेरे लिए पीड़ादायक ही नहीं, बल्कि भयावह यातनाओं से भरा है! मैं जीवन के उस अ...

अंतिम यथार्थ—2

  अहान अभी तक उस कुर्सी पर बैठे उस कलश को टकटकी लगाए देख रहा था! फिर न जाने उसे क्या सूझा वह इस कमरे से बाहर निकल आया! उसके घर के एन सामने एक विशाल रेतीला मैदान है, जो सीधा सागर के किनारे तक जाता है! वासुदेव काका का घर गांव के अन्य घरों से थोड़ा सा दूर है, ज्यादा नही, यही कोई 200 मीटर! गांव के मुख्यालय से बासुदेव काका के घर तक एक पक्की सड़क बनी है जो काका से घर के बगल तक, एन दाहिने ओर समाप्त होती है! अहान घर के बाहर दरवाजे हर खड़ा एक सुकून की गहरी सांस लेता है, लेकिन संसय के बादल अभी थी उसे घेरे हुए है! चांदनी स्निग्ध सी पूरे विशाल रेतीले मैदान में छितरी पड़ी है और उस स्निग्घ रोशनी में रेत का कण–कण स्वर्ण की भांति चमक रहा है! हल्की–हल्की शीत लहर अब चलने लगी है, जो उसके अंग–अंग में नवचेतना का संचार कर करती है, और एक सिरहन उसके पूरे बदन में दौड़ पड़ती है! वह एक क्षण कुछ सोचता है फिर घर के दरवाजे से आगे कदम रखता है और सीधा चलने लगता है, सागर के किनारे की ओर! थोड़ी देर चलते–चलते सागर के करीब पहुंच जाता है! सागर में उठ रही लहरों की उफान वह स्पष्ट सुन सकता है! ठीक समुद्र तल के ऊपर आकाश म...

अंतिम यथार्थ —1

  कमरे में एकदम सन्नाटा था! सन्नाटे से मेरा मतलब सिर्फ इतना है कि जगनुओं और झींगुर की कर्कश ध्वनि के अतिरिक्त कोई और शोर नही था! लग रहा था मानो वो रात उस पल में कैद होकर रह गई हो — या उस पल में ठहर जाना इस रात की नियति हो! खैर जो भी लेकिन वक्त उस पल में ठहर सा गया था!! चूंकि ये घर उड़ीसा के बहरामपुर से महज 20km दूर था– समुद्र से थोड़ा सा दूर– तो ठंडी तेज हवाओं का चलना लाज़मी था लेकिन आज एक पत्ता भी नही हिल रहा था! और गर्मी भी भीषण थी! अहान निस्तब्ध सा अपनी कुर्सी बैठा हुआ, न जाने कितने अरसों का मौन साधे हुए, उस कलश को निहारे जा रहा था— कलश मिट्टी का और उसके ऊपर लाल–कत्थई कपड़ा लपेटा हुआ था! उस कलश में क्या था– पता नहीं! लेकिन जिस एकाग्रता से वह उस कलश पर नजर गढ़ाए हुए था ऐसा प्रतीत होता था मानों उसकी जिस्मों–जान कैद हो उसमें!! अकसर कहानियों में होता है न– किसी सैतान की जान कबूतर में कैद हो! लेकिन इस हकीकत के परिदृश्य में किसकी जान किसमें कैद थी—पता नही! उसके मन में  विचारों की उत्कंठा अपने चरम पर थी! जिस अस्तित्व को वो इतने वर्षों से खुद में समेट बैठा था– आज उसकी ये अंतिम रात ...