अंतिम यथार्थ —1

 कमरे में एकदम सन्नाटा था! सन्नाटे से मेरा मतलब सिर्फ इतना है कि जगनुओं और झींगुर की कर्कश ध्वनि के अतिरिक्त कोई और शोर नही था! लग रहा था मानो वो रात उस पल में कैद होकर रह गई हो — या उस पल में ठहर जाना इस रात की नियति हो! खैर जो भी लेकिन वक्त उस पल में ठहर सा गया था!! चूंकि ये घर उड़ीसा के बहरामपुर से महज 20km दूर था– समुद्र से थोड़ा सा दूर– तो ठंडी तेज हवाओं का चलना लाज़मी था लेकिन आज एक पत्ता भी नही हिल रहा था! और गर्मी भी भीषण थी! अहान निस्तब्ध सा अपनी कुर्सी बैठा हुआ, न जाने कितने अरसों का मौन साधे हुए, उस कलश को निहारे जा रहा था— कलश मिट्टी का और उसके ऊपर लाल–कत्थई कपड़ा लपेटा हुआ था! उस कलश में क्या था– पता नहीं! लेकिन जिस एकाग्रता से वह उस कलश पर नजर गढ़ाए हुए था ऐसा प्रतीत होता था मानों उसकी जिस्मों–जान कैद हो उसमें!! अकसर कहानियों में होता है न– किसी सैतान की जान कबूतर में कैद हो! लेकिन इस हकीकत के परिदृश्य में किसकी जान किसमें कैद थी—पता नही! उसके मन में  विचारों की उत्कंठा अपने चरम पर थी! जिस अस्तित्व को वो इतने वर्षों से खुद में समेट बैठा था– आज उसकी ये अंतिम रात थी!! उसे पूर्णत: इस बात ज्ञान था जो वो आज है कल नही होगा! और जिस दुनिया में वो आज तक जीता आया है कल वो इस दुनिया में नही होगा– कल कहां होगा पता नही! आज के बाद उसके सारे सपने, सारी ख्वाइशें धूमिल हो जायेगी! और अंत में रह जायेगा मात्र शून्यता!


 घर काफी बड़ा है– दो माले का! उस घर में अहान की ब्रद्ध माताजी जगरानी देवी, उम्र 50 साल, एक धार्मिक महिला है! ईश्वर में गहन श्रद्धा है और नित्य पूजा पाठ किया करती है! इसके अतिरिक्त वे एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भी हैं और बच्चों को पढ़ाना उनको बेहद पसंद हैं, साथ ही वे अनेक सामाजिक कार्यों में संलग्न रहती है, जैसे गरीबों को भोजन कराना, तूफान प्रभावित क्षेत्र होने के कारण वे राहत और बचाव कार्य में भी आए दिन लगी रहती हैं! अहान के पिता, वासुदेव शर्मा, उम्र महज 55 साल, गांव के सरपंच हैं! बड़े भले आदमी है! आज गांव का बच्चा–बच्चा स्कूल जा सकता है, शिक्षा प्राप्त कर सकता है, ये सब उन्ही की वजह से तो संभव हो सका! कुछ साल पहले तो चौमास के दिनो में गांव में जगह–जगह पानी भर जाता था और पूरा गांव ताल–तल्लैया हो जाता था! वो तो कृपा हो वासुदेव काका की जिनकी वजह से गांव में पक्की सड़कें बन सकी! पिछला सरपंच तो सारे सरकारी पैसे को खा गया और डकार भी नही लिया! खुद के, और अपने बाल–बच्चन के घर, महल बनवा लिए! वो तो जब से वसेदेव काका सरपंच बने है तब से इस गांव ने विकास की सीढ़ी पार की और तभी से बनी पक्की सड़कें, पक्के मकान, घर–घर शौचालय, स्कूल, अस्पताल, आंगनवाड़ियां और विकास की लहर पूरे गांव में दौड़ पड़ी! आसपास के गांव के लोग अक्सर वासुदेव काका की मिसालें कुछ इस प्रकार देते हैं — 

"सरपंच हो तो ऐसे, वरना सरपंची तो हमारे गांव के चूतिया भी करते हैं!”


खैर जो भी हो लेकिन एक बात तो है हमारे बासुदेव काका लाखन में एक है! उनका एक बड़ा बेटा भी है — अनुभव, उम्र 25 साल, साफ्टवेयर इंजीनियर है, और इंफोसिस में काम करता है! शादीसुदा है! उसकी पत्नी जिज्ञासा बड़े ख्यालात की है, और भुवनेश्वर के एक संपन्न परिवार की बेटी है! आईआईटी भुवनेश्वर में ही अनुभव और जिज्ञासा एक दूसर से मिले और प्रेम संबंध में पड़ गए! अभी एक वर्ष पहले ही उनका प्रेम विवाह संपन्न हुआ था! अनुभव और जिज्ञासा दोनो भुवनेश्वर में रहते हैं, और जब भी गांव घूमने आते हैं, तब जिज्ञासा अपनी सासू मां के कामों में हाथ बंटाया करती है! वे दोनो तो जगरानी काकी और बासुदेव काका को अपने साथ भुवनेश्वर ले जाने की जिद करते है, मगर बासुदेव काका और जगरानी अम्मा मना कर देते हैं! कहते हैं ये गांव ही उनकी जिंदगी है, और इसे छोड़कर वे भुवनेश्वर चले भी जाएं मगर, उसका मन यही गांव में रह  जायेगा! इसलिए वे चाहते हैं कि वे अपने जीवन का अंतिम समय यही वितायें, इन्ही लोगों के बीच, इन्ही की सेवा करते हुए और आखिर पूरा गांव उनके लिए एक परिवार के जैसा ही तो है, और अनुभव भी अपने माता–पिता की भावनाओं को अच्छे से समझता है और अब जिद भी नही करता!! अहान, वासुदेव काका का सबसे छोटा बेटा है, उम्र महज 18 साल है, लेकिन सपने बहुत बड़े, और एक आजाद जिंदगी की ख्वाइश भी! दुनिया को देखने का उसका नजरिया वाकी लोगों से एकदम अलग है! वह अक्सर खुद से एक ही सवाल किया करता है "हम जन्म लेते है, बड़े होते है, शिक्षा प्राप्त करते है, नौकरी करते है, शादी करते है, बच्चे होते है, फिर बच्चों के लिए कमाते है और अंततः मर जाते है!" लेकिन इन सबका अर्थ क्या है? आखिर जीवन का अर्थ क्या हैं? क्यों हम जीवन के इतने पहलुओं से गुजरते है जब पता है कि एकदिन मरना तो है ही? जब उसे उस सवाल का कभी जवाब नही मिला जो उसने अपने जीवन की एक व्याख्या स्वयं ही बना ली— कि वह अपने जीवन के हर एक पहलू को खुलकर जीयेगा, चाहे दु:ख हो या सुख हो, चाहे खूब आनंद हो, चाहे उसे भयाभय यातनाओं का सामना करना पड़े! हां वेशक उसका ये कदम जीवन की अर्थहीनता को कम नहीं करेगा लेकिन जब किसी दिन के अंत में सब कुछ छितरे अंधकार में विलीन होगा, तब वह कम–से–कम एक सुकून की नींद तो सो सकेगा इसी ख्याल के साथ कि बो जो भी कर रहा है, उसे वह करना पसंद है, और जब वह मरेगा तो दिल को एक तस्साली होगी कि उसने अपनी जिंदगी खुलकर जी! वास्तव में वह दुनिया के किसी भी अनुभव से वंचित नहीं रहना चाहता है और हर अनुभव को अपनी त्वचा रूपी दीवारों के भीतर के शून्य में लिप्त आकाश में कैद कर लेता चाहता हैं— जो अनुभव उसके भीतर की शून्यता को मिटा देंगे! अखंड नास्तिक प्रवृति का है, और ईश्वर से तो सौ कदम दूर ही चलता है! पहले वह सोचता था कि हर कोई नास्तिक क्यों नही है? क्यों कुछ लोग इस बात को समझ नही पाते कि ईश्वर की रचना स्वयं मानव ने अपने स्वार्थ और जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए की है और जाति और धर्म महज इंसानों को बांटने के लिए बने हैं! वक्त के साथ उसकी लोगों से उनके ईश्वर को छीन लेने की प्रवृति तो मिट गई लेकिन जातियों और धर्मों के नाम पर लोगो को बांटने और अंधश्रद्धा और पाखंड फैलाने का वह कट्टर विरोधी आज भी है और मरते दम तक रहेगा! लेकिन उसकी लोगों से उनका ईश्वर छीन लेने की प्रवृति के विलुप्त हो जाने के पीछे भी एक गहन कारण छिपा है— भगवान लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण अंग ही नही बल्कि एक आधारभूत शिला है! जब भी लोगों को गहन दुखों और कष्टों का सामना करना पड़ता है तो लोग भगवान का ही स्मरण करते है और उनको आशा रहती है, कि भगवान एक–न–एक दिन उनके जीवन के सारे कष्टों को हर लेगा और जब वे खुश होते है तब भी वे भगवान को उनके जीवन से अलग नहीं होने देते! लोगों की सुबहें शुरू होती है भगवान से प्रार्थना के साथ और शामों में भी भगवान ही होता है! लोग को होली आने की खुशी होती है, दीपावली आने का उत्साह होता है, और रक्षाबंधन का बेसब्री से इंतजार भी— क्यों? क्योंकि ये त्योहार भगवान से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े हुए है,और साथ ही इन त्योहारों के बहाने ही सही, मगर इंसान खुश हो लेता है! और विशेषकर गावों के इलाकों में, जहां पर शिक्षा का अभाव है, वहां पर लोगों की भगवान पर निर्भरता सर्वाधिक है, लोग भगवान को प्यार करते है, और वही उनके जीवन का एकमात्र मसीहा है! हां वो बात और है कि अधिकांशतः लोग भगवान से प्रेम के नाम पर अंधश्रद्धा और पाखंड फैलाते है, उन चीजों पर जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है, और लोगों को भी समझना चाहिए कि दशरहे के दिन तुम रावण के पुतले चलकर क्या कर लोगो जब तुम अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, झूट और पाखंड को न मिटा सके! व्यर्थ है, तुम्हारा रावण के पुतले जलाना व्यर्थ है अगर तुम अपने भीतर के मानवीय अवगुणों को न जला सके! नादिगों में गणेश को सिराकर तुम उन नदियों को प्रदूषित करते हो, जो नदियों में रहने वाले जलीय जीवों के लिए प्राणघातक होता है, इस तध्य का ज्ञान है आपको? नही! बेहोश हो, आप तो धर्म के नशे में धुत्त पड़े हो? आपको कैसे ज्ञान होगा! अगर नदियों में सिराना है तो – अपना अहंकार सिराओ, अपनी ईर्ष्या सिराओ! खैर ये कभी और, पहले अपनी उस बात पर वापस आते है! जिस दिन इन भोले–भाले लोगो से बीच से उनका भगवान छीन लिया जाएगा, जिस दिन इन लोगों को पता लगेगा की जिस सर्वशक्तिमान, सर्बब्यापी, और  अजर ईश्वर को वो इतने वर्षों से पूजते आए है, जिस भगवान को वो उनके दुखों और कष्टों को हर लेने वाला मसीहा समझ रहे थे, उसका कोई अस्तित्व नहीं है! उस दिन ये लोग घनघोर अवसाद और अस्तित्ववाद से पीड़ित हो जायेंगे! इनका जीवन पूर्णत: अर्थहीनता के शाए में लिप्त हो जायेगा! और तब होलिका दहन की रात उत्साह और उल्लास से हीन होगी, दिवाली पर लोग खुशियां नही मनाएंगे और रक्षाबंधन का दिन सावन मास का कोई आम दिन होगा– क्यों ? क्योंकि ईश्वर है ही नही तो उससे जुड़े त्योहार कैसे सत्य हो सकते है! जिस अस्तित्ववाद से अहान खुद पीड़ित है, वह इन‌ मासूम लोगों पर उसकी काली परछाई हरगिज नहीं पड़ने देना चाहता– और इसीलिए उसने सोच लिया है कि वह लोगों से उनके ईश्वर को न छीनकर, उन्हें चैन से जीने दे, परंतु समाज में ईश्वर के नाम पर हो रहे ढकोसलों और रूढ़ियों को रोकने के भरसक प्रयास करे!


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