अरसों की बातें
और वहां से शुरू होगा एक और सफर! कैसा महसूस होता है जब हम सब कुछ जीत लेते हैं— यह धरती, आकाश और पाताल! जब ये सरसराती हवाएं, ये वृक्ष, वन – बापी और ब्रह्मांड का प्रत्येक अंग हमारे अधीन हो जाता है! दिन ढलेगा, रात आएगी और फिर एक नई सुबह, लेकिन कोई अंतर नहीं पड़ेगा हमारे सब कुछ जीत लेने या हार जाने से! शून्यता नैसर्गिक है, जिसे न तुम नकार सकती हो और न मैं!
अपने जिस अस्तित्व की खोज में, जिस उत्साह और सब कुछ जीत लेने की जिस ख्वाहिश से यहां इतनी दूर तक आया हूं मैं, वे तीनों उस वृक्ष के नीचे उस अर्थहीनता की चादर ओढ़े बैठे हैं! समय खुद में अरसों की उस निरंकुशता में लिप्त एक लयबद्ध तरीके से गतिमान है, लेकिन परिवर्तन कुछ भी नहीं! मैंने सब कुछ जीत लिया है— तुम, यह धरती, और अनंत तक फैला यह समस्त ब्योम— लेकिन बदला कुछ नहीं!
वर्षों बीत चुके हैं... हमारे दरमियान उस आखिरी बात को हुए, जब तुमने कहा था… तुमने कहा था कि एक दिन मैं सब कुछ जीत लूंगा! तुम्हें पता है, मैंने सब कुछ जीत लिया है! लेकिन इस जीत को सहन करना, और सहन करते रहना, मेरे लिए पीड़ादायक ही नहीं, बल्कि भयावह यातनाओं से भरा है! मैं जीवन के उस अकाट्य बेतुकेपन को हृदय में समाए अब तक जीने का बस अभिनय ही कर रहा हूं, यथार्थ में तो मेरी आत्मा भी इस तथ्य को पूर्णत: स्वीकार कर चुकी है कि जिस शून्यता से किसी पल जन्म हुआ था मेरा, उसी शून्यता के श्याम से मेघ आज तक मेरे अस्तित्व को घेरे हुए हैं, और मेरी अंतिम यात्रा के साथ फिर से उसी शून्यता में विलीन हो जाऊंगा मैं, और रह जाएंगे ये पेड़, वन और वापी, और दूर तक फैला वह असीम क्षितिज, जिसे ताकते हुए, तुम्हें याद कर न जाने कितनी उदास शामें गुजारी हैं मैंने!
तुम आना, मेरी अस्थियों को अपनी अंजुरियों में भरना, और सागर के उसी आखिरी किनारे पर बैठकर, उन्हें लहरों को समर्पित कर देना, जिस पर बैठकर ढेर सारी बातें किया करते थे हम! और तब तुम्हारे हाथों के स्पर्श से मुक्त हो जाऊंगा मैं! और वहां से शुरू होगा एक और सफर— शून्य से प्रारंभ का, शून्य में प्रारब्ध तक!!
~ सूरज शर्मा
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