अंतिम यथार्थ—2

 अहान अभी तक उस कुर्सी पर बैठे उस कलश को टकटकी लगाए देख रहा था! फिर न जाने उसे क्या सूझा वह इस कमरे से बाहर निकल आया! उसके घर के एन सामने एक विशाल रेतीला मैदान है, जो सीधा सागर के किनारे तक जाता है! वासुदेव काका का घर गांव के अन्य घरों से थोड़ा सा दूर है, ज्यादा नही, यही कोई 200 मीटर! गांव के मुख्यालय से बासुदेव काका के घर तक एक पक्की सड़क बनी है जो काका से घर के बगल तक, एन दाहिने ओर समाप्त होती है! अहान घर के बाहर दरवाजे हर खड़ा एक सुकून की गहरी सांस लेता है, लेकिन संसय के बादल अभी थी उसे घेरे हुए है! चांदनी स्निग्ध सी पूरे विशाल रेतीले मैदान में छितरी पड़ी है और उस स्निग्घ रोशनी में रेत का कण–कण स्वर्ण की भांति चमक रहा है! हल्की–हल्की शीत लहर अब चलने लगी है, जो उसके अंग–अंग में नवचेतना का संचार कर करती है, और एक सिरहन उसके पूरे बदन में दौड़ पड़ती है! वह एक क्षण कुछ सोचता है फिर घर के दरवाजे से आगे कदम रखता है और सीधा चलने लगता है, सागर के किनारे की ओर! थोड़ी देर चलते–चलते सागर के करीब पहुंच जाता है! सागर में उठ रही लहरों की उफान वह स्पष्ट सुन सकता है! ठीक समुद्र तल के ऊपर आकाश में पीतम छाया हुआ है मानो आज सागर और अंबर के मिलन की रात है! वह एकटक किनारे पर पहुंचता है, लहरों के एन सामने, और उस ठंडक भारी रेत पर बैठ जाता है, पैरों को आगे पसारकर – चुपचाप, शांत और एकदम निस्चेष्ठ, और ताकने लगता है दूर फैले इस क्षितिज को, उस आकाश के सूनेपन को! कभी लहरें भरभराहट के साथ उसके कदम चूमने लगती है मानो उसके अस्तित्व को स्वयं में विलीन कर लेते की अभिलाषा हो, तो कभी पावनें स्वयं में शीतम समाए उसके बदन को एकटक झकझोर देती है मानो उसे अपने संग उड़ा ले जाने की ख्वाइश हो, अहान उन लहरों और पावनों के द्वंद्व का प्रत्यक्षदर्शी हैं! यह द्वंद्व उसे असमंजस में डाल देता है कि वह अपना अस्तित्व किसे समर्पित करे, उन लहरों के बेसर्त प्रेम को, या उन हवाओं की प्रीति को, और वह अपने अस्तित्व को समर्पित करे भी तो कैसे, जिस अस्तित्व को वो खो चुका है! वह रेत की एक मुट्ठी भरता है, और अपने सर के एन सामने बुहारता है, मानो उन रेत के कण–कण में वह अपने अस्तित्व की तलाश कर रहा हो! वह थक चुका है, एक गहरी नीद सोना चाहता है, और वही रेत पर लेट जाता है! रेत की ठंडक उसके बदन में एक अमन और सुकून का एहसास  कराती है! कुछ ही देर में वह एक गहरी सयनावस्था में प्रवेश कर जाता है, जिसमें उसके ख्याल और विचार थम से गए है, उसे बस एक चीज का अहसास होता है, प्रेम– एक सार्वभौमिक प्रेम, जो उन हवाओं के झरोकों में भी है, और उन लहरों की चंचलता में भी– जिनमें न तो कोई प्रेम करने वाला है, न कोई प्रेम को पाने वाला, वल्कि जो कुछ दुनिया में है वो प्रेम ही है!  वो लहरें भी प्रेम है, वो हवाएं भी प्रेम है, वो ठंडी रेत भी प्रेम है और उसका बदन जिन अणुओं और परमाणुनों से मिलकर बना है वह भी प्रेम है, और अंततः उसकी आत्मा भी प्रेम है! इस प्रेम पर किसी का अधिकार नहीं! यह तो बस बहता है, ठीक उन हवाओं के जैसे, सीमाहीन, निरंतर, अनवरत!


मुर्गे ने बांग दे दी है, और वासुदेव काका और जगरानी अम्मा एक गहरी नीद से कुछ देर पहले ही जागे हैं, मानो वर्षों के बाद सोएं थे! अनुभव और जिज्ञासा भी गांव आए हुए हैं, और ऊपर वाले कमरे में सो रहे हैं! काका और अम्मा द्वार पर बैठे हुए हैं, द्वार पर पड़ी चारपाई पर, ठीक एक दुसरे के‌ सामने! कोई किसी से कुछ नही बोलता और अपने–अपने ख्यालों और विचारों के द्वंद्व में स्वयं ही उलझे हुए हैं! अम्मा काका को देखती है, और काका नीचे उस धरती पर अपनी निगायें गड़ाएं हुए है! कुछ पल नीचे थरती को ताककर काका बीड़ी सुलगा लेते है, और पहला कस लगाते है मानो अपने अंदर उमड़ रहे भावनाओं के समंदर को कुछ पल के लिए भुला देना चाहते हैं!

"कै बार बोले हैं बीड़ी मत पीया करिए, फिर कहे पीते हैं?" जगरानी अम्मा खामोशी तोड़ते हुए कहतीं हैं!

"नहीं बस ऐसेइ पी लई आज, मन हो रहो हतो!" काका, रूंथे हुए गले से अम्मा की ओर निगाहें करते हुए जवाब देते हैं!

"वाकी याद आइ रही?" जगरानी अम्मा थोड़ा सा सोचकर बोलती हैं!

काका कुछ जवाब नही देते, जवाब तो उनकी कपोलों से उतरते आसुओं से दे दिया है, भावनाओं का वो बांध जिसे वो इतने दिनों से अपने अंदर समेटे रखें हुए थे, आज टूट गया! अम्मा काका के सर को अपने आंचल में छुपा लेती हैं, और उनकी भी आंखें भर आती हैं! आखिर दोनो की भावनाओं का बांध एक दिन टूटना ही था!  इंसानों की यही खास बात होती है कि वे अपने दर्दों को छुपा लेते है, किसी अपने को बताने में भी परहेज करते हैं, और रोना तो मानो उनके लिए शर्म की बात है! 

मैं तो कहता हूं –


जब मन करे रो लीजिए,

क्योंकि जज्बातों का बोझ 

आंखों से ज्यादा दिल पर होता हैं!


तो क्यों न उन जज्बातों के बोझ को आंखों पर लिया जाए, मन हल्का हो जायेगा! काहे उसे दिल में रखकर खुद को तकलीफ देते हैं!


भोर का वक्त है, सूरज दूर उस क्षितिज से निकलने लगा है और प्रकाश सम्पूर्ण धरा को अपने दामन में भर लेता है! काका और अम्मा सागर के किनारे पर पूजा की तैयारी कर रहें हैं, और जिज्ञासा अम्मा के साथ काम में हाथ बटा रही है! अनुभव पास में बैठा है, और दूर सागर में लहरों की चंचलता को अपलक देखे जा रहा है!

"अनुभव!" काका होले से कहते हैं!

"अनुभव!" काका फिर से कहते हैं!

"हां हां!"

"जी पापाजी! "अनुभव मानों एक गहरी नीद से जागता है, और जवाब देता है!

"बेटा पंडितजी को बुलाइ ला, पूजा की तैयारी‌‌ है‌ गई!" काका, हल्की सी आवाज में अनुभव से कहते हैं!

"ठीक हैं पापाजी!" अनुभव जवाब देता हैं, और खड़ा होता है! अपने बदन से लिपटे रेत को झड़ता है, और चल देता है, गांव की ओर!

"और हां, बु कलश ले आईओ, अहान के कमरा में धरो है!" काका फिर से कहते हैं!

अनुभव पीछे मुड़कर देखता हैं और बिना कुछ कहे हामी भरता हैं, 

और काका भी बिना सुने ही समझ जाते हैं!

"आप हवन के लें लड़की लेकें आए का?" काकी हवन सामग्री के पैकेट को खेलती हुई काका से पूछती है!

"ना अभई ना,  अभियाल लेके आतों!" काका जबाव देते हैं

"फिर देर है जागी, पंडितजी आवत ही होंगे"

"ठीक है मैं लेके आवतों" काका कहते है और गांव की ओर रुख करते है!

जिज्ञासा और काकी दोनो हवन की सामग्री के पैकेट को एक एक करके खोलते है! दौनो के मन की चंचलता उस सागर में उठ रही लहरों की कल–कल की ध्वनि के ताल मिलाती है, और भावनाओं का सैलाब तीव्र बेग से दोनो के मन में हिलोरे लेता है!

"माजी आप रहने दीजिए, लाइए ये सब मैं कर लेती हो!" जिज्ञासा होले से कहती है!

"नही बहू, कोई बात न, मैं संग में करवा लेतिओं, काम जन्दीं समिटि जागौ" काकी एक स्वर में कहती हैं!

जिज्ञासा थोड़ा सा सोचती है फिर बिस्मयात्मकत रूप से कहती है

"भगवान इतना निर्दई कैसे हो सकता है!"

"होनी को कौन टाल सकत है!" रूंधे हुए गले से काकी की आवाज निकलती है!

और इसी के साथ दौनों की आंखें झलकने है! ये कैसी विडंबना है– प्रेम की मात्र एक डोर कट जाने से न जाने कितने रिश्ते ने अपने आंसू बहाए है, कितने ही कलेजे अपने ह्रदय में भावनाओं का उमड़ता हुआ समंदर रखें है, जो बाहर आने को बेताब है! हम सबकी जिंदगी एक नाटकीय ढंग से चलती है, जिसमें किस पल में क्या हो सकता है, इस बात का ख्याल तक नहीं होता, और पता तब चलना है, जब सब कुछ हो जाता है– खुशियों के  पल न जाने कब मौत के मातम में तब्दील को जाते है, एहसास तक नहीं होता!


लगभग सुबह 8 बज चुके है, वातावरण में उमस बढ़ रही है! काका हाथ में पीपल की लकड़ियां लिए और अनुभव, उस लाल–कत्थई कपड़े में बंधे कलश को थामे हुए पंडित के साथ में किनारे की ओर आ रहे है! साथ में गांव के कुछ लोग भी है! जिज्ञासा एकदम से कहती है

"माजी वो लोग आ गए!"

काकी अपने साड़ी के पल्लू से अपने आंसू पौंझती हुई उस तरफ देखती हैं, मानो भीड़ में अपने किसी खोए हुए अक्स को तलाश रही हों! और फिर जिज्ञासा की ओर देखकर कहती हैं

"तू हवन के लें आग जला लै तब तक!"

"ठीक है माजी!"

कुछ ही देर में सब लोग आ जाते है, गांव के लोग तरपाल जो पास में ही बिछी है, पर बैठ जाते है!

पंडित जी हवन के सामने लगे आसान पर दक्षिण की ओर मुंह करके बैठ जाते है, और हाथ के इशारे से अनुभव से उनके ठीक सामने बैठने का आग्रह करते है! अनुभव ठीक उनके सामने बैठ जाता है! काका उसके बगल में! काकी और जिज्ञासा पंडित जी के दाएं हाथ की तरफ थोड़ी सी दूर बैठ जाती है, और पंडितजी के बांई ओर पूरब में सागर खुद में उफनती हुई लहरों को समेटे हुए है!

"अनुभव बेटा, अस्थियों को लेकें आजई इलाहबाद के ले़ं निकर जईओ, पूजा खतम होइबे के तुरंत बाद! वो का है ना,कल सोमोती अमावस्या है, कल कौ शुभ मूहर्त है, अस्थि विसर्जन के लऐं!" पंडित जी हवन कुंड के चारों ओर पानी छिड़कते हुए कहते है!

"हम अस्थियों का विसर्जन यहीं समुद्र में करेगें!" अनुभव जवाब देता हैं!

पंडितजी भौहें चढ़कर एकदम से कहते हैं,

"यहां पर काइको़ं??" 

"अहान की आखिरी इच्छा हती कि वाको अस्थि–विसर्जन यहां ही सागर किनारे पर करो जाए!" जगरानी अम्मा जवाब देती हैं! 

काकी जी की बात सुनकर कुछ पल के लिए अतीत के चलचित्र जिज्ञासा के नेत्रों के समझ दौड़ने लगाते है!

अहान भुवनेश्वर से करीब दो साल बाद गांव आया था! उसने अपनी बारहबी की परीक्षा इसी साल दी थी और अब उसे कॉलेज जाना था!  जिज्ञासा और अनुभव भी उसके साथ में आए हुए थे! घर में आते ही मानो वर्षों से शांत चहल पहल जीवंत हो उठी, और मां की ममता उन तीनो पर बरसने सी लगी थी!! चूंकि अनुभव सबसे बड़ा बेटा है लेकिन अहान की नजर में मां–बाप का प्यार उसे अपने बड़े भाई से ज्यादा मिला है! अहान, अनुभव, और जिज्ञासा तीनो का रिश्ता समाज द्वारा थोपे गए रिश्तों से पहले एक दोस्ती का है! तीनो शहर के माहौल में बड़े शोक से रहे है! साथ में कई बार, या यूं कहिए हर वीकेंड को बाहर घूमने जाना उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा रहा है! कभी यूं ही घूमने जाते थे, कभी फिल्में देखने, तो कभी पास के जंगल में ट्रैकिंग और एडवेंचर के लिए, तो कभी वेबजह शहर की गलियों के आयाम को नापने! भुवनेश्वर में ऐसा कोई पर्यटन स्थल वाकी नही रहा है जो इनकी पहुंच के दायरे में न रहा हो– चाहे राजरानी मंदिर हो, या हीराकुंड बांध! उस दिन अहान के कहने पर ही तीनो गांव घूमने आए थे! काकी ने आते ही उनके खाने के लिए एक के बाद एक पकवान बनाना शुरू कर दिए! तीनो खाना खाने के बाद गेस्ट रूम में ऐसे ही बातें कर रहे थे कि तभी काकी "गुलाबजामुन गुलाबजामुन" कहते हुए गुलाबजामुन लेकर आ गई!

तीनों ये सुनकर हस पड़े!

"माजी आप गुलाबजामुन का प्रचार कर रही है क्या?" जिज्ञासा हंसकर पूछती है!

"नही, वो तो अहान को गुलाबजामुन बहुत पसंद है तो बाके काएं बनाए!" काकी मुस्कुराहट के साथ जवाब देती हैं!

"मम्मी आपको हर बार अहान ही याद आती है, मेरी पसंद–नापसंद से कोई फर्क नही पड़ता!" अनुभव चंचलता के साथ कहता है!

"वो भैया मम्मी–पापा आपको कचरे से उठाकर लाए थे न इसलिए!"अहान अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहता है! और इसी बात पर अहान और जिज्ञासा ठहाका मारकर हंसते है!

"चल–चल तू बच्चा है तब से जनता हूं! मुझे नही, तुझे कचड़े से उठाकर लाए थे!" अनुभव दाव पलटते हुए कहता है!

"अरे तुम दोनो अब लरिवो मत शुरू करो, किसी को कचरे से उठाकर न लाओ गओ!" काकी बचाव करते हुए कहती है!

"और ये लो गुलाबजामुन खाओ!" काकी ट्रे को बढ़ाती है!

जिज्ञासा ट्रे को अपने हाथ में लेती है! एक–एक प्लेट दोनो को देती है ! 

"माजी आइए हम दोनो मां–बेटी साथ में खायेंगे!" जिज्ञासा तीसरी प्लेट को हाथ में लेकर कहती है!

"ना बहू, तू खा मेरी इच्छा न है!" काकी अपना बचाव कहते हुए कहती हैं!

"अगर आप नही खायेंगी तो हम भी नही खायेंगे! " अनुभव और अहान दोनो अपनी प्लेट को सोफा पर रखते हुए कहते हैं!

"हां माजी खा लीजिए वरना इन दोनो को भूखा करना पड़ेगा और हां मुझे अपनी बेटी कहिए, बहु नहीं!" जिज्ञासा हंसकर कहती है!

"अच्छा ठीक है बेटी, ला खा लेती हों! काकी हार मानकर कहती है! अहान और अनुभव अपनी अपनी प्लेट उठाते है और एक–दूसरे की ओर देखकर ऐसे मुस्करातें है मानो कोई जंग जीती हो!

"मम्मा पापा कहां पर है, हम जब से आए है वो दिखे नही?"! अहान आधी गुलाबजामुन मुंह में रखे हुए पूछता है!

"बा बलराम के दादा खत्म है गए एं, तो बाके संग अलाहबाद गंगा मैया में अस्थि–विसर्जन के लें गए एं, कल शंझा तक आ जागें!" काकी वर्णनात्मक स्वर में कहती हैं!

"गंगा में ही क्यों ? यहां पास में सागर किनारे पर विसर्जन कर देते!"

"देखि! अब तू अजान कैसे सवाल पुछेगो तौ, ते सवाल को मे पास कोई जवाब ना है!"

 "अच्छा ठीक है, नही पूछूंगा! लेकिन जब मैं मरूं तो मेरा अस्थि–विसर्जन यहीं सागर के किनारे करना!" अहान मजाकिया अंदाज में कहता है! उसकी इस बात पर काकी निस्तब्ध रह गई! जिज्ञासा और अनुभव तो उसके साथ रहे हैं तो उन्हैं उसके पागलपन का एहसास था! उनके लिए उससे ऐसी बातें  अपेक्षित ही थीं!

"चल–चल, ऐसी अशुभ बात घर में मत करीवे कर!" काकी थोड़े से गुस्से के साथ कहती है, मगर उस गुस्से में अपने बेटे के प्रति फिक्र साथ झलक रही थी!

"इसमें अशुभ क्या है? आप ही बताइए ना भाभी!" अहान जिज्ञासा से पूछता है!

"माजी अहान का स्क्रू थोड़ा ढीला है! जाने दीजिए बिचारे को!" जिज्ञासा ठहाका मारकर हंसते हुए कहती है!

"भाभीीईईईईईईईईईईईईईई!" 

"मजाक कर रही थी बचुवा! तकल्लुफ काहे करते हो!" चंचलता भरी आवाज के साथ जिज्ञासा कहती है!

"पागल है दोनो–के–दोनो!" अनुभव यह कहते हुए, अपनी खामोशी एक मुस्कुराहट के साथ तोड़ता है!

"अच्छा, हम दोनो पागल और आप हो दिमाग वाले.. है ना अनुभव सिन्हाााा?" जिज्ञासा अनुभव पर रीझकर कहती हैं!

"भाभी सिन्हा नही...शर्मा!" अहान जिज्ञासा की बात को रोककर कहता है!

"कुछ भी कह दो, क्या फर्क पड़ता है!" और तीनो हसने लगते है!

काकी यह सब गुमसुम सी देखती रही! उसके तीनो बच्चे खुश थे (आखिरी जिज्ञासा उनकी बेटी समान है)! यहां पर रिश्ते थे, लेकिन उनमें मनमुटाव नहीं! प्रेम था लेकिन स्वार्थ नहीं! और यही सोचकर काकी भी खुश थीं!


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