नियति

किसी पाषाण और विटप का सफर,
भी परिणति होती है,
उन्हीं भयाभय वेदनाओं की,
जिनसे जुड़ा होता है हर मानुष का रिश्ता
ठीक उसके जन्म से,
तुम चाहो भी, और मैं चाहकर भी,
इस पीड़ा से मुक्त नहीं हो सकते—
जैसे मुक्त नहीं होते ये पाषाण और विटप
समय के वहाव से!
ये फिर लैटेंगे
एक नया रूप नई आकृति लेकर,
सीप–शंख, या छाल के जैसे,
उन यातनाओं को फिर–से भोगने,
और भोगते रहने के वास्ते,
स्वयं की नियति का निर्वाह करने
ये फिर लैटेंगे !
पर तुम चाहो भी, और मैं चाहकर भी,
इस पीड़ा से मुक्त नहीं हो सकते,
जैसे मुक्त नहीं होते ये पाषाण और विटप
समय के बहाव से!!


~ सूरज शर्मा





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