तापिश और तुम

मेरे घोड़े के कदमों की रफ्तार इन हवाओं को चीरती हुई निकल रही है! आज सारे संसार की निगाहें मुझ पर हैं! इन लोगों को लगता है, मैं सब कुछ जीत लूंगी—धरती, आकाश, पाताल और अंततः अनंत तक फैले हुए ब्रह्मांड को! लेकिन इन यातनाओं, इन दुखों और पीड़ाओं को खुद में समेटकर, मुझे सब कुछ जीत लेना कभी गंवारा नहीं होगा! कुछ है विस्मित सा, जो मेरी रूह को, मेरे जिस्म को इस कदर नोच रहा है, जो मेरे लिए अवर्णित है!


कुछ देर बाद जब मैं हार को गले लगाऊंगी, तब लोगों की निगाहें नहीं, उंगलियां उठेंगी मुझ पर! साथ ही मेरे काफिले से सजा का मोहताज बनना पड़ेगा मुझे! शायद सारा दिन मुझे चटकती धूप में खड़ा रखें, या फिर एक सौ कोड़ों की मार का आघात मेरे जिस्म को सहना पड़े, लेकिन वो इस पीड़ादायक जीत से बेहतर ही होगा! मुझमें सब कुछ जीत लेने की चाह नहीं, और अपनी चाहत के विरुद्ध कुछ करना पीड़ा से कम नहीं! या फिर मेरी नासिका से बहती यह लहू की धार मुझे अंत तक पहुंचने से पहले ही मूर्छित कर दे! पता नहीं!

कुछ भी हो, लेकिन मैं नहीं जीतूंगी! जीत लेना कभी इस यात्रा का उद्देश्य था ही नहीं—मैं बस लड़ना चाहती थी अंतिम सांस तक और मैं लड़ी—जी-जान से लड़ी! बेशक, इन लोगों की उंगलियां प्रश्न करेंगी मुझसे कि जीती हुई जंग को मैंने इतनी तन्मयता से क्यों हारा? क्योंकि शायद मुझमें सब कुछ जीत लेने की ख्वाहिश भी नहीं रही, तो फिर मैं क्यों जीत लूं सब कुछ! मेरी मुट्ठी से खिसकती इस घोड़े की लगाम मेरी देह से निकलते प्राणों की गवाही देती है!

कुछ देर और, और मैं हार जाऊंगी, लेकिन वह हार मेरे लिए हार न होकर एक सुकून होगा—इस पीड़ा से मुक्ति का सुकून, उस घृणा से मुक्ति का सुकून जो खुद से की है मैंने! मुझमें इस जहां को जीत लेने की लालसा कभी थी ही नहीं! मैं तो उस जंग से जीतना चाहती थी, जो मेरी खुद से थी! मेरी अंगुलियां अब शिथिल पड़ने लगी हैं! मेरी आंखों के सामने एक अजीब सा धुंध छाने लगा है! और मेरा मन किसी गहरे संदेह में उलझा हुआ है, संदेह—कि जिंदगी और मौत के दरमियान कितना फासला होता है? कैसा लगता है खुद को मरते हुए देखना? पता नहीं!

अन्य लोगों के लिए यह अनुभव कैसा हो सकता है? हो सकता है, लोग रोएं जब उनको पता चलेगा कि वे मरने वाले हैं! आखिर, जिंदा रहने की ख्वाहिश रखना एक मानवीय प्रवृत्ति है! इसके अतिरिक्त, कुछ लोग खुश भी हो सकते हैं, क्योंकि उनको जीवन की यातनाओं से मुक्ति मिल जाएगी! पर मैं क्या महसूस कर रही हूं? पता नहीं! मुझे बस इतना पता है कि कुछ ही देर में जब इस घोड़े की लगाम मेरे हाथों से छूटेगी—वो पल मेरा आखिरी पल होगा, और तब मेरे प्राण मेरे शरीर से मुक्त होकर बिखर जाएंगे इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड में, और अंत में रह जाएगा हाड़-मांस और रक्त का पुतला! वो कवच, जिसने मेरी रूह को मेरे जन्म से अब तक हिफाजत से रखा, आज उससे मेरा वास्ता टूट जाएगा!
पर मुझे खुशी है कि अब मैं हर बंदिश से मुक्त हो जाऊंगी! और तहे दिल से इस बेज़ुबान घोड़े का शुक्रिया—मेरी अंतिम यात्रा का साथी बनने के लिए! खुदा हाफ़िज़!! 

"सरदार! सरदार! गजब हो गया, सरदार!" सांगा चिल्लाता हुआ कक्ष में कदम रखता है!
"क्या हुआ, नमकहराम! इतनी जोर-जोर से किस बात का ढिंढोरा पीट रहे हो! आवाज धीमी करके बोलो, वरना तुम्हारी जुबान खिंचवा ली जाएगी!" सिंहासन पर बैठा हुआ एक इंसान जोर से कहता है!
"सरदार, आकृति ने घोड़े से गिरकर मौत को गले लगा लिया!" सांगा सिर नीचे करके धीरे से कहता है!
"यह लड़की भी न, कितनी बेतुकी थी!" सरदार सिर का ताज उतारते हुए कहता है!!

~ सूरज शर्मा

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