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विकृति

जीवन कैद हो किसी गुफा में या किसी गहरी अंधेरी कालकोठरी में जिसकी दीवार पर दिखे अस्तित्व की क्षीण रग्ण सी परछाइयाँ! उससे परे क्या है, तुम्हें नहीं पता! हो सकता है तुम्हारी मुक्ति की लालसा ने यह जानने की अथक कोशिशें की हों मगर कुछ दायरे जिनके परे तुम कभी जा ही न सके! तुम बस कैद हो उस गुफा में अनंतकाल से—और कैद हैं तुम्हारे दिन और रातें, सुबह और शामें उसमें! तुम्हारी आत्मा में एक घुटन का एहसास है मगर तुमने दबा लिया हो उसे भी अपनी यातनाओं और कुंठाओं के साथ, अपने ही ख्वाहिशहीन और निश्चेष्ठ मन की आड़ में! तुम्हारे सीने में विकृतता के आघात इतने गहरे हो जिनसे अधिक प्रबल अन्य पीड़ा अकल्पित हो, फिर भी तुम जिए जाओ, क्योंकि तुम्हारे पास कोई और रास्ता नही है, तुम्हें बस जीना है और जिए जाना है क्योंकि मुक्ति इतनी आसान नहीं है, तुम्हें ये बात पता है! "मेरी नीद के खुलते ही एक अश्रु की बूंद का मेरी आंख से झलकना, और फिर उसका क्षणभंगुर होकर बिखर जाना— ये महज एक इत्तफाक नहीं हो सकता!” ~ सूरज शर्मा

अरसों की बातें

और वहां से शुरू होगा एक और सफर! कैसा महसूस होता है जब हम सब कुछ जीत लेते हैं— यह धरती, आकाश और पाताल! जब ये सरसराती हवाएं, ये वृक्ष, वन – बापी और ब्रह्मांड का प्रत्येक अंग हमारे अधीन हो जाता है! दिन ढलेगा, रात आएगी और फिर एक नई सुबह, लेकिन कोई अंतर नहीं पड़ेगा हमारे सब कुछ जीत लेने या हार जाने से! शून्यता नैसर्गिक है, जिसे न तुम नकार सकती हो और न मैं! अपने जिस अस्तित्व की खोज में, जिस उत्साह और सब कुछ जीत लेने की जिस ख्वाहिश से यहां इतनी दूर तक आया हूं मैं, वे तीनों उस वृक्ष के नीचे उस अर्थहीनता की चादर ओढ़े बैठे हैं! समय खुद में अरसों की उस निरंकुशता में लिप्त एक लयबद्ध तरीके से गतिमान है, लेकिन परिवर्तन कुछ भी नहीं! मैंने सब कुछ जीत लिया है— तुम, यह धरती, और अनंत तक फैला यह समस्त ब्योम— लेकिन बदला कुछ नहीं! वर्षों बीत चुके हैं... हमारे दरमियान उस आखिरी बात को हुए, जब तुमने कहा था… तुमने कहा था कि एक दिन मैं सब कुछ जीत लूंगा! तुम्हें पता है, मैंने सब कुछ जीत लिया है! लेकिन इस जीत को सहन करना, और सहन करते रहना, मेरे लिए पीड़ादायक ही नहीं, बल्कि भयावह यातनाओं से भरा है! मैं जीवन के उस अ...

अंतिम यथार्थ—2

  अहान अभी तक उस कुर्सी पर बैठे उस कलश को टकटकी लगाए देख रहा था! फिर न जाने उसे क्या सूझा वह इस कमरे से बाहर निकल आया! उसके घर के एन सामने एक विशाल रेतीला मैदान है, जो सीधा सागर के किनारे तक जाता है! वासुदेव काका का घर गांव के अन्य घरों से थोड़ा सा दूर है, ज्यादा नही, यही कोई 200 मीटर! गांव के मुख्यालय से बासुदेव काका के घर तक एक पक्की सड़क बनी है जो काका से घर के बगल तक, एन दाहिने ओर समाप्त होती है! अहान घर के बाहर दरवाजे हर खड़ा एक सुकून की गहरी सांस लेता है, लेकिन संसय के बादल अभी थी उसे घेरे हुए है! चांदनी स्निग्ध सी पूरे विशाल रेतीले मैदान में छितरी पड़ी है और उस स्निग्घ रोशनी में रेत का कण–कण स्वर्ण की भांति चमक रहा है! हल्की–हल्की शीत लहर अब चलने लगी है, जो उसके अंग–अंग में नवचेतना का संचार कर करती है, और एक सिरहन उसके पूरे बदन में दौड़ पड़ती है! वह एक क्षण कुछ सोचता है फिर घर के दरवाजे से आगे कदम रखता है और सीधा चलने लगता है, सागर के किनारे की ओर! थोड़ी देर चलते–चलते सागर के करीब पहुंच जाता है! सागर में उठ रही लहरों की उफान वह स्पष्ट सुन सकता है! ठीक समुद्र तल के ऊपर आकाश म...

अंतिम यथार्थ —1

  कमरे में एकदम सन्नाटा था! सन्नाटे से मेरा मतलब सिर्फ इतना है कि जगनुओं और झींगुर की कर्कश ध्वनि के अतिरिक्त कोई और शोर नही था! लग रहा था मानो वो रात उस पल में कैद होकर रह गई हो — या उस पल में ठहर जाना इस रात की नियति हो! खैर जो भी लेकिन वक्त उस पल में ठहर सा गया था!! चूंकि ये घर उड़ीसा के बहरामपुर से महज 20km दूर था– समुद्र से थोड़ा सा दूर– तो ठंडी तेज हवाओं का चलना लाज़मी था लेकिन आज एक पत्ता भी नही हिल रहा था! और गर्मी भी भीषण थी! अहान निस्तब्ध सा अपनी कुर्सी बैठा हुआ, न जाने कितने अरसों का मौन साधे हुए, उस कलश को निहारे जा रहा था— कलश मिट्टी का और उसके ऊपर लाल–कत्थई कपड़ा लपेटा हुआ था! उस कलश में क्या था– पता नहीं! लेकिन जिस एकाग्रता से वह उस कलश पर नजर गढ़ाए हुए था ऐसा प्रतीत होता था मानों उसकी जिस्मों–जान कैद हो उसमें!! अकसर कहानियों में होता है न– किसी सैतान की जान कबूतर में कैद हो! लेकिन इस हकीकत के परिदृश्य में किसकी जान किसमें कैद थी—पता नही! उसके मन में  विचारों की उत्कंठा अपने चरम पर थी! जिस अस्तित्व को वो इतने वर्षों से खुद में समेट बैठा था– आज उसकी ये अंतिम रात ...

तापिश और तुम

मेरे घोड़े के कदमों की रफ्तार इन हवाओं को चीरती हुई निकल रही है! आज सारे संसार की निगाहें मुझ पर हैं! इन लोगों को लगता है, मैं सब कुछ जीत लूंगी—धरती, आकाश, पाताल और अंततः अनंत तक फैले हुए ब्रह्मांड को! लेकिन इन यातनाओं, इन दुखों और पीड़ाओं को खुद में समेटकर, मुझे सब कुछ जीत लेना कभी गंवारा नहीं होगा! कुछ है विस्मित सा, जो मेरी रूह को, मेरे जिस्म को इस कदर नोच रहा है, जो मेरे लिए अवर्णित है! कुछ देर बाद जब मैं हार को गले लगाऊंगी, तब लोगों की निगाहें नहीं, उंगलियां उठेंगी मुझ पर! साथ ही मेरे काफिले से सजा का मोहताज बनना पड़ेगा मुझे! शायद सारा दिन मुझे चटकती धूप में खड़ा रखें, या फिर एक सौ कोड़ों की मार का आघात मेरे जिस्म को सहना पड़े, लेकिन वो इस पीड़ादायक जीत से बेहतर ही होगा! मुझमें सब कुछ जीत लेने की चाह नहीं, और अपनी चाहत के विरुद्ध कुछ करना पीड़ा से कम नहीं! या फिर मेरी नासिका से बहती यह लहू की धार मुझे अंत तक पहुंचने से पहले ही मूर्छित कर दे! पता नहीं! कुछ भी हो, लेकिन मैं नहीं जीतूंगी! जीत लेना कभी इस यात्रा का उद्देश्य था ही नहीं—मैं बस लड़ना चाहती थी अंतिम सांस तक और मैं लड़ी—जी...

नियति

किसी पाषाण और विटप का सफर, भी परिणति होती है, उन्हीं भयाभय वेदनाओं की, जिनसे जुड़ा होता है हर मानुष का रिश्ता ठीक उसके जन्म से, तुम चाहो भी, और मैं चाहकर भी, इस पीड़ा से मुक्त नहीं हो सकते— जैसे मुक्त नहीं होते ये पाषाण और विटप समय के वहाव से! ये फिर लैटेंगे एक नया रूप नई आकृति लेकर, सीप–शंख, या छाल के जैसे, उन यातनाओं को फिर–से भोगने, और भोगते रहने के वास्ते, स्वयं की नियति का निर्वाह करने ये फिर लैटेंगे ! पर तुम चाहो भी, और मैं चाहकर भी, इस पीड़ा से मुक्त नहीं हो सकते, जैसे मुक्त नहीं होते ये पाषाण और विटप समय के बहाव से!! ~ सूरज शर्मा

बंधित स्मृतियाँ

 मैंने अपनी आत्मा का सारा प्रेम सारी प्रीति उन पंक्तियों उन कविताओं में समेट दी है, जिनमें बात होती है सिर्फ तुम्हारी और मेरी, हमारी पहली मुलाकात की, और एक कहानी की शुरुआत की जिनमें बात होती है विरह के असहनीय दर्द की और जिनमें बात होती है, हमारे उस आखिरी किनारे पर मिलन की भी! हां, इनमें अब जो कुछ भी तुम्हारे हिस्से का है तुम रख लो, और अपना अस्तित्व मुझे दे दो!   ~ सूरज शर्मा