सपने
हम सब अस्तित्व के लिए लड़ रहे थे उस दफा, एक हजारों की भीड़! मुझे ठीक–ठीक तो याद नही, मगर इतना पता है कि एक जंग जरूर थी! हम सब खुद को बचा लेना चाहते थे उस त्रासदी से जो हमारी नियति में शायद हमारे जन्म से पहले से अंकित कर दी गई थी! एक ओर तो मृत्यु की दिशा और दशा दोनो को बदल देने का जुनून हम सबके नेत्रों में झलक रहा था, तो वहीं दूसरी ओर, एक भय की सिरहन हमारे बदन से दौड़ पड़ी! भय किसका था? पता नहीं! मौत का, या उस अनुभूति को अनुभूत कर लेने का कि हम मरने वाले हैं! हम सब लड़ना भी चाहते थे, हमने प्रयास भी किए मगर ऐन वक्त पर उस मौत के कोहराम की भीभत्सता को देखकर हम सब भाग खड़े हुए! शायद हमारी आने वाली पीढ़ियां हमें कायर कहेगी ये ख्याल भी हमारे मस्तिष्क की दीवारों में उभरा जरूर था मगर हमने उसे भी दबा दिया एक और ख्याल की परत से — “व्यर्थ की बहादुरी दिखलाकर हम सभ्यता की विलुप्ति की वजह बनें इससे कहीं बेहतर है हम कायरों की तरह भागकर इस सभ्यता के एक अंश को बचा लें!” और हमने वही किया! वो असुर सा विशालकाय कोई बनमानुस के जैसा भयंकर अपने पैने नाखूनों में उसे दबाकर निगल गया! मैं भागा भी उसे बचाने को मगर ...